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सईद की रिहाई के बाद

जमात-उद-दावा के मुखिया हफीज सईद को देर-सवेर रिहा होना ही था। मुंबई में हुए आतंकी हमले के बाद से पाकिस्तान सरकार ने जो रुख शुरू से ही अपनाया है, उसके बाद और कोई उम्मीद भी नहीं थी। यह तो संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की पहल थी कि सईद को गिरफ्तार किया गया, वर्ना शायद यह सूरत भी नहीं बनती। और फिर अदालत में पकिस्तान सरकार की तरफ से जो दलीलें आईं, वह उसकी रिहाई का रास्ता बनाने के लिए ही थीं। सरकारी वकील का अदालत में यह कहना कि सईद के खिलाफ कोई सबूत नहीं है, गिरफ्तारी तो संयुक्त राष्ट्र के कहने पर हुई है, यह सब सरकार की नीयत को ही बताता है। सईद की रिहाई का यह भी अर्थ है कि देर-सवेर पाकिस्तान सराकार जकी रहमान लखवी समेत उन पांच लोगों को भी रिहा कर ही देगी, जिन्हें मुंबई कांड के सिलसिले में गिरफ्तार किया गया है। हम चाहें तो यह भी जोड़ सकते हैं कि आतंकवाद से लड़ाई के पाकिस्तान के संकल्पों की एक बार फिर पोल खुल गई है। लेकिन यह सब दोहराना भी अब निर्थक ही है। पाकिस्तान की नीयत को भांपने के लिए अब नए उदाहरणों की जरूरत किसी को भी नहीं है। यह सोचना भी व्यर्थ है कि पाकिस्तान में बैठे आतंकवादियों से लड़ाई हम वहां एक अंतरराष्ट्रीय मंच पर मिठबोली सरकार के भरोसे लड़ सकते हैं जो घुमा-फिरा कर आतंकी घुसपैठ को शह देती रही है।

पाकिस्तान के आतंकवाद से लड़ाई राजनयिक स्तर पर ही लड़ी ज सकती है लेकिन यह काम अब कुछ ज्यादा ही मुश्किल हो गया है। अमेरिका तालिबान के खिलाफ अपनी लड़ाई पाकिस्तान के भरोसे ही लड़ रहा है, और इस सहयोग के बदले में वह भारत के खिलाफ की ज रही पाकिस्तान की गुस्ताखियों को नजरंदाज कर देता है। यह आशंका अब सच साबित होने लगी है कि अच्छे और बुरे तालिबान के वर्गीकरण का जो सिद्धांत अमेरिका ने अपनाया था, वह आखिर में भारत के खिलाफ ही जएगा। वे सारे आतंकी गुट जिनकी राजनीति किसी भी तरह से अमेरिका के खिलाफ जती है उन्हें बुरे तालिबान की श्रेणी में रख दिया गया है और सरकार या आईएसआई की शह पर भारत के खिलाफ सक्रिय आतंकवादियों को अच्छे आतंकवादी बना दिया गया है। अब भारतीय राजनय के सामने सबसे बड़ी चुनौती विश्व जनमत को इस नितांत बेहूदा वर्गीकरण के खतरे बताने की है। पाकिस्तान हाफिज सईद को रिहा करने का काम बिना ऐसे किसी सिद्धांत की सहूलियत के भी कर सकता था, लेकिन फिलहाल तो समय उसकी यह बैसाखी छीनने का है।

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