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और छोटी हो जाएगी इलेक्ट्रॉनिक चिप

इलेक्ट्रॉनिक्स की दुनिया में वैज्ञानिकों ने एक नए तत्व की खोज कर ली है। यह तत्व कॉर्बन का अपरूप ग्रेफीन है। वैज्ञानिक यह उम्मीद कर रहे हैं कि आने वाले समय में ये तत्व सिलिकॉन का पर्याय बन सकता है। जैसा कि आप जानते हैं कि सिलिकॉन का इस्तेमाल कंप्यूटर चिप में होता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि ग्रेफीन की टू-डायमेंशनल आकृति के कारण सिलिकॉन की तुलना में इससे छोटी चिप बनाई जा सकती है।

ग्रेफीन
इलेक्ट्रॉनिक्स की दुनिया में ग्रेफीन नया तत्व है। यह एक अणु के बराबर चौड़ा होता है जो दिखने में पतले चिकन के तार जसा है। इसकी सरंचना ने यूनाइटेड किंगडम, टेक्सास और जॉíजया के शोधकर्ताओं का ध्यान इसकी तरफ खींचा। उन्होंने ग्रेफीन का इस्तेमाल कई चीजों जैसे कंप्यूटर चिप, कम्युनिकेशन डिवाइस और टचस्क्रीन में किया। ग्रेफीन कार्बन का अपरूप है, जिसका अध्ययन कई दशकों से किया ज रहा है। यह तत्व तब तक वज्ञानिकों के लिए बिलकुल महत्वपूर्ण नहीं था, जब तक इसे सिलिकॉन के पर्याय के तौर पर खोज नहीं गया था। 2004 में इंग्लैंड की मैनचेस्टर यूनिवíसटी के भौतिकविदों ने ग्रेफीन को उत्पन्न कर सकने के तरीके का प्रदर्शन किया। इस प्रक्रिया में ग्रेफाइट के विभिन्न स्तरों को उतारा गया जिसे मैकेनिकल एक्सफोलाइशन नाम दिया गया।

कहां हो सकता है इस्तेमाल
ग्रेफीन का पहला कमíशयल इस्तेमाल एलसीडी स्क्रीन, सोलर सेल और टच स्क्रीन की इलैक्ट्रिकल कोटिंग करने में किया गया। शोधकर्ता अगले जेनरेशन की कंप्यूटर चिप्स में ग्रेफीन का प्रयोग करने के बारे में विचार कर रहे हैं। वर्तमान में कंप्यूटर चिप सिलिकॉन से बनाई जती है। कई इंजीनियरों का कहना है कि वह यह जनने की कोशिश कर रहे हैं कि चिप के आकार में कितने छोटे ट्रांजिस्टरों का इस्तेमाल किया ज सकता है। कोलंबिया विश्वविद्यालय के इलैक्ट्रिकल इंजीनियर केन शेफर्ड का कहना है कि सिलिकॉन की और छोटी चिप बना सकना मुश्किल काम था, साथ ही इन्हें बनाने में लागत भी ज्यादा आती है।

कैसे बनता है ग्रेफीन
वर्तमान में एक सामान्य चिप कंडक्िटंग, इंसुलेटिंग और सेमीकंडक्िटंग स्तर से मिलकर बनी होती है। तीनों ही स्तर अलग-अलग तत्वों से मिलकर बनते हैं। वहीं ग्रेफीन इन तीनों भूमिकाओं में पूरी तरह फिट बैठती है। नोवोसेलोव के दल ने हाल में ग्रेफीन के ऐसे रूप का विकास किया है, जो हाइड्रोजन से क्रिया कर इंसुलेटर की तरह काम करता है।

क्या हैं दिक्कतें
हालांकि ग्रेफीन में वह सारे गुण मौजूद हैं जो कंप्यूटिंग एप्लीकेशन के लिहाज से जरूरी होते हैं, लेकिन वज्ञानिकों के सामने सबसे बड़ी चुनौती ये थी कि यह पूर्ण सेमीकंडक्टर की तरह व्यवहार करें। ग्रेफीन में एक महत्वपूर्ण प्रॉपर्टी की कमी है, वह स्विच के रूप में काम नहीं कर सकता। स्विच के तौर पर काम न कर पाने की वजह से यह इलैक्ट्रिसिटी का प्रवाह लगातार करता रहता है और कभी बंद नहीं होता।

इलिनॉय विश्वविद्यालय में फरवरी में हुई रिसर्च में शोधकर्ताओं ने दिखाया कि ग्रेफीन से बने ननोरिबन को इस तरह काटा जता है कि वह ऑन और ऑफ फंक्शन में सक्षम हो। कुछ इंजीनियरों का यह मानना है कि स्विचिंग की समस्या गंभीर है। शेफर्ड मानते हैं कि ग्रेफीन का इस्तेमाल एनालॉग सिस्टम, राडार, सेटेलाइट कम्युनिकेशन और इमेजिंग डिवाइस में होगा। शेफर्ड कोलंबिया और आईबीएम की उस टीम के सदस्य हैं जिसने डिफेंस एडवांस्ड रिसर्च प्रोजेक्ट एजेंसी (डारपा) के लिए ग्रेफीन से फील्ड इफेक्ट ट्रांजिस्टर का निर्माण किया है जो मुख्यत: तेज आवृत्ति पर कमजोर सिग्नलों को प्रवíधत करता है।

जहां तक एनालॉग डिवाइस में ग्रेफीन के प्रयोग की बात है, तो उसमें कई तरह की मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है जिसमें सबसे बड़ी दिक्कत ग्रेफीन के बैच बनाना है। इसको बनाने का सबसे बढ़िया तरीका है कि आप स्कॉच टेप का प्रयोग करके थ्री-डायमेंशनल ग्रेफाइट के स्तरों को छील सकते हैं, लेकिन कई मायनों में यह विधि बेहतर साबित नहीं होती। वज्ञानिक यह स्वीकारते हैं कि अगर प्रोडक्शन को सुधारा जए, तो ग्रेफीन एनर्जी इंडस्ट्री में क्रांतिकारी परिवर्तन ला देगा।

टेक्सास विश्वविद्यालय के रॉड रॉफ का कहना है कि ग्रेफीन से बनने वाले अल्ट्राकैपिसिटर (ऊज्रा को एकत्रित करने वाली डिवाइस) की क्षमता वर्तमान में इस्तेमाल होने वाली स्टोरेज डिवाइस की तुलना में दोगुनी हो जाएगी। 

ग्रेफीन की खासियत
ग्रेफीन में कई महत्वपूर्ण गुण होते हैं। इलैक्ट्रॉन को ग्रेफीन के मुकाबले सिलिकॉन से कम विरोध ङोलना पड़ता है। ग्रेफीन टू-डायमेंशनल तत्व है, जिसकी सहायता से छोटी डिवाइस बनाई ज सकती है। इसके अलावा, टू-डायमेंशनल होने का फायदा ये होता है कि इनमें इलैक््रिटसिटी को नियंत्रित करना, त्रिविमीय (थ्री-डायमेंशनल) तत्वों की तुलना में ज्यादा आसान होता है।

पतली, पारदर्शी, ज्यादा चालकता और मजबूत होने के कारण इसे कई कार्यो के लिए बेहतर तत्व माना ज रहा है। जॉíजया टैक्नोलॉजी के भौतिकविद वाल्ट डी. हियर का कहना है कि ग्रेफीन टेराहर्ट्ज की फ्रीक्वेंसी पर ऑपरेट कर सकता है, साथ ही ग्रेफीन की प्रतिरोधकता को कम कर देने की क्षमता के कारण यह ज्यादा गर्म भी नहीं होता है। मैनचेस्टर विश्वविद्यालय के भौतिकविद कोस्ताया नोवोसेलोव कहते हैं कि ग्रेफीन अपने गुणों के कारण काफी शक्तिशाली होता है।

कार्बन के बंध काफी शक्ितशाली होते हैं जिस कारण सिर्फ कुछ ट्रांजिस्टर और अणु होने पर भी यह तीव्र वद्युत धारा का सामना करने में सक्षम होता है। नोवोसेलोव कहते हैं कि वाकई में यह आश्चर्यजनक तत्व है। ग्रेफीन की इलैक्ट्रिकल प्रॉपर्टी में भी बदलाव किया जा सकता है।

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