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इस अहदे सियासत से बस एक गुजारिश है

नई बड़ी सरकार पारिवारिक लगती है। ज्यादातर मंत्री अपने घर के हैं। नए सुन्दर युवा चेहरे। ज्यादातर किसी के रिश्तेदार। स्वतंत्रता सेनानियों के नाती-पोते देश की सेवा करने के वास्ते आए हैं। वे लोग पारिवारिक प्रशिक्षण के कारण राजनीति की बेहतर समझ रखते हैं। टीवी चैनलों के सामने बोलने का उनमें बेहतर आत्मविश्वास है।

राजनीति हमें सही या गलत रास्ते पर ले ज सकती है। उसकी खासियत है कि समाज का श्रंष्ठतम और निकृष्टतम इसमें शामिल रहता है। हमें युवा वर्ग की जरूरत है। पर हमारे पास पॉलिटिकल रिक्रूटमेंट का कोई खाका नहीं है। आदी के पहले आंदोलनों के सहारे लोग जुड़ते थे। फिर छात्रसंघों के सहारे भी कुछ युवा राजनीति में आए। इधर इसका रास्ता दिखाई नहीं पड़ रहा।

जिन्हें करियर बनाना है, उन्हें कोचिंगों से फुरसत नहीं। बचते हैं वे नौजवान जिनके जन्म लेते ही उनका करियर तय हो गया था। उन्हें देर-सवेर राजनीति में आना ही होता है। जिनकी पैतृक सम्पदा राजनीति है, उनके बीच भी कम्पिटीशन है। इसलिए मारग्रेट अल्वा को कड़वी बातें बोलकर अपने करियर को दाव पर लगाना पड़ा। करुणानिधि हैं, जिन्हें तय करना है कि किसे किस तरह की विरासत सौंपी जए। बहरहाल, परिवारों ने चुनाव जीता अब उन्हें मंत्री बनना है।

कैबिनेट शब्द का एक अर्थ होता है, छोटा प्राइवेट रूम या स्टडी। कैबिनेट और बड़ी अल्मारी में आकार का फर्क है। वेस्टमिनिस्टर पद्धति में इंग्लिश प्रिवी काउंसिल को राय देने वाला छोटा सा सब ग्रुप कैबिनेट होता था। छोटा सा। मनमोहन सिंह की 78 सदस्यीय टीम में 33 कैबिनेट मंत्री हैं। सात स्वतंत्र प्रभार वाले और 38 छोटे मंत्री हैं। विभागों का महत्व इस बात से तय नहीं होता कि वे जनता की क्या सेवा करते हैं। बल्कि इस बात होता है कि उनमें धंधे-पानी का डौल कितना है। 

कहा गया कि इसबार सरकार बगैर दबाव के बनेगी। साफ-सुथरे लोग मंत्री बनेंगे। जनसेवा और अपनसेवा के बीच लकीर खींचना मुश्किल काम है। सेवाभाव का दबाव बाहरी दलों की ओर से ही नहीं अपनी पार्टीं के भीतर से भी है। इस रोग का इलाज करते हैं खानदानी दवाखाने। कांग्रेस का दोष है कि उसमें खानदान का राज चलता है। फिर यह भी माना जता है कि पार्टी बची इसलिए है कि इसका नेतृत्व करने के लिए एक खानदान है। डीएमके, अन्ना डीएमके, शिवसेना, बीजद, सपा, अकाली दल, जेडीएस सहित अनेक पार्टिया व्यक्ितयों या परिवारों के इर्द-गिर्द बनीं हैं। चुनाव परिणाम आते ही राहुल गांधी के नाम का जकारा लगने लगा। समझ में आ गया कि कांग्रेस पार्टी कायम है।

व्यावहारिक राजनीति के साथ हमारी व्यवस्था चलेगी। इसका समाधान जनता की सामूहिक समझ कभी करेगी। फिलहाल यह राजनीति जरूरी है, क्योंकि देश के तमाम काम इसकी बदौलत सुधरेंगे या बिगड़ेंगे। राजनीति में वही नहीं होता जो दिखाई पड़ता है। राजनेता वही सफल है, जो दो काम कर सकता है। जनता की भावनाओं का दोहन और अपने आधार का तेज विस्तार। दोनों काम भलमनसाहत से नहीं होते।

बावजूद इसके राजनैतिक कर्म पर मर्यादाओं का शुगर कोट होता है। ओहदे तकसीम होने के बाद अब सरकार का काम शुरू होगा। राजनीति अपने दोहरे चेहरे के साथ हािार है। पिछले साल इन्हीं दिनों न्यूक्िलयर डील को लेकर वामदलों के साथ सरकार का टकराव चल रहा था। उसकी परिणति समर्थन वापस लेने और विश्वासमत हासिल करने में हुई। जब लोकसभा में बहस हुई तो वह मुद्दा ही नहीं रहा।

आज से नई लोकसभा अपना काम शुरू करेगी। नया माहौल है। 1984 के चुनाव के बाद 1995 की जनवरी में नई सरकार आई तो पहली बार धोती-कुर्ते की जगह सफारी संस्कृति ने प्रवेश किया। राजीव गांधी ने इक्कीसवीं सदी का नया मुहावरा दिया। वह आज और भी मौाू है।

शायद अब बेहतर काम हो। फिर भी राजनैतिक संस्कृति के लिहाज से हम आगे बढ़ते नार नहीं आते। जनता सिर्फ सरकार बनाने के लिए वोट नहीं डालती। जनता ने लोकसभा दी। लोकसभा ने सरकार दी, पर पाच साल तक इस सदन को तमाम विधायी काम करने हैं।

वे काम सरकार चलाने से ज्यादा महत्वपूर्ण हैं। पर क्या सांसद अपनी भूमिका को समझते हैं? सामाजिक कल्याण, शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास, न्याय और रोजगार से जुड़े मसलों पर कितनी बहस होती है। जिस तरह इन कार्यों से जुड़े मंत्रालय कमतर हैं, उसी तरह इन मसलों पर चर्चा भी उपेक्षित रहती है। जिन विभागों के व्यावसायिक महत्व है, उन्हें लेकर राजनेता उत्साहित रहता है। टेलीकम्युनिकेशन क्यों महत्वपूर्ण है? इसलिए नहीं कि सामाजिक विकास में इसकी भूमिका है, बल्कि इसलिए कि इसमें अच्छा डौल है। यह बात कहते हुए कोई राजनेता शर्मसार नहीं होता।
हम अपनी प्राथमिकताओं को देखें। इस साल देश में करीब पौने तीन करोड़ बच्चे जन्म लेंगे। इनमें से बीस-पच्चीस लाख अगले चुनाव तक जीवित नहीं बचेंगे। करीब डेढ़ करोड़ को पौष्टिक आहार नहीं मिलेगा। करीब इतनों को स्कूली शिक्षा भी नहीं मिलेगी। स्कूल गए भी तो वह नाम मात्र का होगा। इनमें से करीब बीसेक लाख उच्च शिक्षा के लेवल तक पहुचेंगे।

उस शिक्षा की गुणवत्ता के बारे में भी आप बेहतर जनते हैं। इन बच्चों को स्वस्थ-शिक्षित और काम-काजी बना दें तो भारत दुनिया की नम्बर एक अर्थव्यवस्था बन जए। बड़ी से बड़ी मंदी हमें छू भी नहीं पाएगी। इन बच्चों के भोजन पर खर्च को हम किसी तरह दुगना कर सकें तो अर्थ व्यवस्था नौ फीसदी से ऊपर अपने आप चली जएगी।

उपभोक्तावाद से डराने की नहीं उपभोक्ता बनाने की जरूरत है। माग बढ़ाने की जरूरत है। नागरिकों की उपभोग क्षमता बढ़ाएं। वे अनुसंधान करें या खेती का आधुनिकीकरण करें, अन्न की उपलब्धता बढ़ाएं। चीन और कोरिया जसे देश खेती के लिए बाहरी देशों में ामीन खरीद रहे हैं। हम सौभाग्यशाली हैं कि अन्न संकट से बचे हैं, पर हमें अनाज का उत्पादन बढ़ाने की जरूरत है।

हमें निर्यात की नहीं अपने घरेलू उपभोग को बढ़ाने की फिक्र करनी चाहिए। अपने आधार-ढाचे को देखें। तमाम निर्माण कार्यों पर राजनीति की निगाहें लगीं हैं। ठेकों-लाइसेंसों से जुड़े लोग राजनीति में घुसे हैं। निर्माण बढ़ाने के लिए प्रशासनिक कुशलता और तुरत फैसले करने वाली मशीनरी चाहिए। सब्सिडी की लोकलुभावन राजनीति को खत्म होना चाहिए। इसकी बजह से सरकार घाटे में रहती है और बैंक सरकारी घाटे को पूरा करते रहते हैं।

वे उद्यमियों को पूजी देने में नाकाम रहते हैं। अकुशल और भ्रष्ट प्रशासनिक मशीनरी हमारी समस्या है। हमारा पहला काम अपनी गरीबी और अज्ञान को दूर करना होना चाहिए। इसमें हमारे आर्थिक विकास के सूत्र छिपे हैं। और यह बात राजनीति को समझनी चाहिए। राजनीति ही इसे ठीक कर सकती है।

pjoshi@ hindustantimes. com

लेखक ‘हिन्दुस्तान’ में दिल्ली संस्करण के वरिष्ठ स्थानीय संपादक हैं।

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