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उर्दू मीडिया : समर्थन से जुड़े बुनियादी सवाल

मनमोहन सरकार के गठन के साथ ही मुसलमानों के विभिन्न क्षेत्रों में प्रतिनिधित्व को लेकर चर्चाओं और प्रश्नों का क्रम शुरू हो गया है। इससे संबंधित समाचारों और टिप्पणियों को प्रमुखता से उर्दू मीडिया में जगह मिल रही है। लगभग सभी उर्दू समाचार-पत्रों ने इस पर सम्पादकीय लिखा है और मुस्लिम बुद्धिजीवियों के जिम्मेदारों के वक्तव्य पर आधारित लम्बी-लम्बी रिपोर्ट प्रकाशित की है।

‘हमारा समाज’ ने ‘मुसलमान फिर भुला दिए गए’ शीर्षक से अपने सम्पादकीय में लिखा है कि सच्चई यह है कि राजनैतिक पार्टियां मुसलमानों के वोट को अपने लिए सफलता का महत्वपूर्ण जरिया समझती हैं। लेकिन जब बात देने वाले अधिकारों की आती है तो उस समय उनकी कार्यप्रणाली से यह पता चल जता है कि वास्तव में मुसलमानों की हमदर्दी का राग अलापने का उनका मकसद केवल चुनाव में मुसलमानों को ब्लैकमेल करना था।

अखबार लिखता है कि संप्रग की कामयाबी में मुसलमानों की भूमिका 50 फीसदी से ज्यादा है। यदि मुसलमानों ने सामूहिक तौर पर अपना समर्थन कांग्रेस की झोली में न डाला होता तो शायद आज संसद का परिदृश्य कुछ और होता और कांग्रेस तो जो स्थान मुस्लिम वोटों के कारण मिला है, शायद यह सपना कभी भी पूरा न होता। क्या इस अवसर पर कांग्रेसी नेताओं से यह सवाल नहीं किया जा सकता है कि मुसलमानों के साथ यह सौतेला व्यवहार क्यों किया ज रहा है।

किशनगंज से नवनिर्वाचित सांसद मौलाना असराऊल हक कासमी ने ‘राष्ट्रीय सहारा’ के अपने स्तंभ ‘घटता मुस्लिम प्रतिनिधित्व और हमारी जिम्मेदारी’ में लिखा है कि एक तब्दीली यह आई है कि मुसलमानों ने उन मुस्लिम उम्मीदवारों को वोट नहीं दिया जिन्होंने एक समय तक इनके वोटों पर सत्ता का मज लूटा, लेकिन खुद मुसलमानों को वादों से बहला दिया, चाहे वह किसी भी पार्टी से हों।

अधिकतर मुस्लिम नुमाइंदे खुद को अतिसेकुलर साबित करने के चक्कर में मुसलमानों के करीब नहीं फटकते। ऐसे अधिकतर मुस्लिम नुमाइंदों को मुसलमानों ने किनारे लगा दिया। इन हालात में जीत कर आने वाले मुस्लिम नुमाइंदों की जिम्मेदारियां बढ़ गई हैं।

पीलीभीत से वरुण गांधी का नाम मतदाता सूची से हटाए जने की इलाहाबाद हाईकोर्ट में दाखिल याचिका पर नाके किदवई ने ‘अखबारे मशरिक’ की अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि साम्प्रदायिक सौहार्द फोरम के अध्यक्ष इकबाल हुसैन कुरैशी की इस याचिका को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सुनवाई के लिए स्वीकार कर लिया है। यदि मुस्लिम संगठन गंभीरता से मुकदमा लड़ें तो बाल ठाकरे की तरह वरुण गांधी का नाम भी मतदाता सूची से कट सकता है। छह साल तक वह न तो वोट हासिल कर सकते हैं न ही वोट दे सकते हैं।

‘फौज में मुसलमानों की संख्या आखिर परदा क्यों’ के शीर्षक से साप्ताहिक ‘अल जमीयत’ ने आईटीआई कार्यकर्ता सैयद अखतर अली के हवाले से लिखा है कि जब उन्होंने सूचना अधिकार कानून 2005 के तहत सेना भवन से यह जनकारी मांगी कि हमारी फौज में कितने मुसलमान हैं और फौज में सिख रेजिमेंट की तरह अब पठान रेजिमेंट क्यों नहीं है।

पहले तो इस सवाल को टालने की कोशिश की गई, लेकिन जब टाल-मटोल से काम न चला तो उन्होंने सवाल पूछने वाले से सवाल पूछना शुरू कर दिया। कर्नल प्रदीप बिष्ट की ओर से सवाल पूछने वाले को एक पत्र मिला कि आपको सवाल पूछने से पहले यह साबित करना होगा कि आप भारतीय नागरिक हैं और इसके दस्तावेजी सुबूत भी देना होंगे।

अखतर अली ने जब दस्तावेजी सुबूत के साथ फिर सवाल पूछा तो लेफ्टिनेंट कर्नल बाला जी की ओर से लिखित जवाब आया कि हमारे पास इस तरह का कोई विवरण मौजूद नहीं है कि फौज में मुसलमानों की संख्या कितनी है। रेजिमेंट बनाने की परम्परा स्वतंत्रता पूर्व की थी। स्वतंत्रता के बाद जो नीति है, उसमें सभी को बराबर रखा गया है। अब जति-पाति, धर्म के नाम पर कोई रेजिमेंट नहीं बनाई ज सकती।

कांग्रेस अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ के चेयरमैन इमरान किदवई पर उर्दू मीडिया में पार्टी की छवि बिगाड़ने की खबर को ‘आफताबे हिन्द’ ने अपनी पहली खबर बनाया है। अखबार ने इमरान किदवई पर आरोप लगाया है कि कांग्रेस पार्टी ने उर्दू अखबारों में विज्ञापन हेतु 80 लाख रुपए दिए थे, जिसमें से केवल पांच लाख रुपए खर्च किए गए और 75 लाख रुपए अपनी जेब में रख लिए।

इमरान किदवई ने अपने कुछ चहेते छोटे उर्दू अखबारों से मोटा कमीशन लेकर लाखों रुपए के विज्ञापन दिलवाए। एक उर्दू अखबार को तो पार्टी से एक करोड़ रुपए का विज्ञापन दिलाया। उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड विधानसभा चुनाव में पार्टी विज्ञापन के लिए लगभग तीस करोड़ रुपए इमरान किदवई को दिए गए थे। पार्टी फण्ड में हेरफेर करने वाले इमरान किदवई के मामले को सेकर कुछ अखबारों के स्वामी युवा नेता राहुल गांधी से मुलाकात कर यह मांग करना चाहते हैं कि इसकी जगह किसी ईमानदार एवं सक्रिय व्यक्ित को इस पद पर बैठाया जए।

लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं।

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