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अधिकार सुख

संसार में सुख बहुत तरह के होते हैं, पर अधिकार सुख सारहीन होते हुए भी सबसे ज्यादा मादक होता है। इसे पाने के लिए मनुष्य अपने और पराए के अंतर को भुलाकर युद्ध तक छेड़ देता है, जिसके पीछे अहंकार और घृणा होते हैं, घृणा में ईष्र्या छिपी होती है। महाभारत इसका प्रमाण है।

मनुष्य पशु और देवता के बीच की कड़ी के समान है, जो कभी मन के बल पर देवता से भी आगे निकल जता है तो कभी अपनी पाशविक वृत्ति दिखाने में पीछे नहीं रहता।सत्ताधारी अधिकार-पद पाकर पागल सा हो जता है, यह भूल जता है कि यह पद सदा के लिए उसका नहीं रहेगा। वह अपनी सफलता का Þोय अपने आप को और अपने भाग्य को देता है्र। पद उसमें अहंकार, दुर्भावना और लालच भरता जता है।

महादंभ का दानव उस पर हावी हो जता है। वह भूल जता है कि शासन का सुख लोगों के मन को जीतने में है, हथियार या शक्ित से डराने में नहीं। क्योंकि डराकर फैलाई गई शांति सतह पर दिखती है, पर अंदर कुलबुलाता आक्रोश एक दिन क्रांति को ले आता है। एक समय आम जनता पदस्थ लोगों को भगवान का रूप मानकर चलती थी, आंख मूंदकर उनकी बातों पर विश्वास करती थी, अब वक्त बदल गया है। आज का जनसामान्य जगरूक है, बुद्धि-विवेक का प्रयोग करता है।

अब वह निर्भय होकर पल भर में स्थिति को पलटने की ताकत रखता है। जरूरी है कि सत्ताधारी हर कदम सोच समझ कर उठाएं। आज सत्कर्म सद्विचार और सद्वाणी धर्म के ही आधार नहीं रह गए हैं, बल्कि अधिकार-सुख के इच्छुक के लिए भी उतने ही जरूरी हो गए हैं।

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