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विदेशी चैनल की टिप्पणी से आहत मुस्लिम ने रामायण रची

विदेशी चैनल की टिप्पणी से आहत मुस्लिम ने रामायण रची

देश की गंगा जमुनी तहजीब पर बदनुमा धब्बा भागलपुर दंगे पर एक विदेशी चैनल की टिप्पणी से आहत डा. अब्दुल अहद रहबर ने जीवन भर हिन्दूमुस्लिम एकता के लिए काम करने का व्रत ले लिया और रहबर रामायण की रचना कर डाली।

देश की गंगा जमुनी तहजीब पर बदनुमा धब्बा भागलपुर दंगे पर एक विदेशी चैनल की टिप्पणी से आहत डा. अब्दुल अहद रहबर ने जीवन भर हिन्दूमुस्लिम एकता के लिए काम करने का व्रत ले लिया और साम्प्रदायिक सौहार्द्र की अलख जगाने वालों में शामिल हो गए।

एक डिग्री कालेज में प्राचार्य डा. रहबर ने ‘राम’ पर शोध शुरू कर दिया और ‘रहबर रामायण’ की रचना कर डाली। इसका विमोचन किया जाना है। रहबर रामायण के अलावा वह कृष्णायन और बुद्धायन काव्य की रचना भी कर रहे हैं।

आजमगढ़ जिले के मूल निवासी डा. रहबर जौनपुर में अब्दुल अजीज अन्सारी डिग्री कालेज में प्राचार्य हैं। उन्होंने कहा कि 1989 में बिहार के भागलपुर जिले में हुए दंगे को लेकर एक विदेशी चैनल की टिप्पणी ने उन्हें झकझोर दिया था और तभी उन्होंने ठान लिया कि वह हिन्दू-मुस्लिम एकता के लिए अपना जीवन समर्पित कर देंगे। चैनल ने टिप्पणी की थी ‘भारत में हिन्दू मुस्लिम एकता के लिए एक और कबीर या रहीम की आवश्यकता है।’

एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि उन्हें कट्टरपंथियों से कोई भय नहीं लगता। अपनी बात साफगोई से रखिए। अपने उसूलों पर अटल रहिए। समाज आपके साथ होगा। जब समाज साथ होगा तो कट्टरपंथी हो या अन्य कोई नकारात्मक सोच वाला आपका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकेगा।

डा. रहबर ने कहा कि वह इस्लाम को मानने वाले हैं। हिन्दू दर्शन का अध्ययन किया है। दोनों धर्मो में ही मानवता का पाठ कूट-कूटकर भरा है। ऐसे में कट्टरपंथ का स्थान ही कहां बनता है। मिलजुलकर रहिए और मजबूर की मदद कीजिए यही दोनों धर्मो का सार है।

उन्होंने कहा कि वह कबीर या रहीम तो नहीं बन सकते लेकिन उनका जरा सा भी अंश अपने में लाने में कामयाब हुए तो जीवन सफल मानेंगे। रामायण लिखने के पीछे कारणों के बारे में उन्होंने बताया कि राम एक ऐसे नायक हैं जो मानवता, मूल्य, दया, करुणा और जीने के तरीके का पाठ पढ़ाते हैं। राम ने समाज के अतिपिछड़े लोगों को गले लगाया। उन्हें प्यार दिया।

उन्होंने कहा कि राम यूं ही आदर्श नहीं बने। आदर्श बनने लायक आचरण किया तभी आज मर्यादा पुरुषोत्तम कहलाते हैं। राम के चरित्र और कर्तव्य के प्रति निष्ठा ने उन्हें ‘रहबर रामायण’ की रचना के लिए प्रेरित किया।

वह रहबर रामायण को हिन्दी साहित्य का महाकाव्य बताते हैं जिसमें उन्होंने ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर अपना दृष्टिकोण रखा है। साम्प्रदायिक सद्भाव की मिसाल डा. रहबर ने राजनीतिक दलों के सत्ता संघर्ष पर भी अपना नजरिया स्पष्ट किया है।

उन्होंने मुस्लिम होने के बावजूद हिन्दू दर्शन का अध्ययन किया और रहबर रामायण की रचना कर डाली। यह ग्रन्थ कट्टरपंथ पर कुठाराघात भी माना जा सकता है।

भारत को अध्यात्म योग और आयुर्वेद की भूमि बताते हुए वह संस्कृत को वैज्ञानिक भाषा करार देते हैं। उनका कहना है कि संस्कृत को अपेक्षित महत्व न मिलने की वजह से इस देश के युवक कई महान ग्रन्थों को पढ़ने से वंचित रह जा रहे हैं। इन ग्रन्थों में जीवन का पूरा सार समाहित है।

उन्होंने बताया कि मूल रामायण में सात काण्ड हैं जबकि रहबर रामायण में मर्यादा काण्ड, गुरुकुल काण्ड, स्वयंवर, नर-वानर विजय और उत्तम काण्ड समेत कुल नौ खण्ड हैं। एक हजार सत्तर दोहे, तीन हजार चौपाइयों वाला इस महाकाव्य की छपाई अंतिम दौर में है।

धर्म-जाति को लेकर हो रहे झगड़े के इस दौर में डा. रहबर समाजिक ताने बाने को मजबूत करने में एक नायक की तौर पर उभरे हैं। वह कहते हैं कि यदि वह अपने उद्देश्य में जरा भी सफल रहे तभी अपना जीवन सार्थक मानेंगे। उनका कहना है कि वह अपने विद्यालय में भी नैतिक मूल्यों और मिलजुल कर रहने का पाठ पढ़ाने पर जोर देते हैं।

डा. रहबर ने कहा कि शांत चित्त से ही आगे बढ़ा जा सकता है। ज्ञान अर्जित किया जा सकता है। अपने कर्तव्यों का निर्वहन किया जा सकता है। शांत चित्त मिलजुलकर रहने से ही होगा। फसाद से तो अशांति ही फैलती है।

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