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जूनियर डाक्टरों की हड़ताल से सैकड़ों मरीजों का जीवन दाँव पर लगा

संजय गांधी पीजीआई कर्मचारियों व जूनियर डाक्टरों की हड़ताल से सैकड़ों मरीजों का जीवन दाँव पर लग गया। वित्त विभाग ने खर्च बचाने के लिए पीजीआई कर्मियों के वेतन निर्धारण की प्रक्रिया राज्य कर्मचारियों के समतुल्य कर दी थी। यह नीतिगत फैसला लेने से पहले कैबिनेट से परामर्श लेने की जरूरत भी नहीं समझी गई। मामले ने राजनीतिक रंग लेना शुरू किया तो उच्चधिकारी चेते। गलती शासन स्तर पर थी इसलिए उन्हें बातचीत की पहल करनी पड़ी। समझोते के बाद वित्त विभाग अब भूल सुधारने में जुटा है। संशोधित शासनादेश तीन चार दिन में जरी होने की संभावना है।

संजय गांधी पीजीआई को अति विशिष्ठ चिकित्सा संस्थान माना जता है इसीलिए पीजीआई में वेतन भत्तों एम्स के समकक्ष हैं। 1990 से पीजीआई चिकित्सकों व कर्मचारियों को एम्स के समकक्ष वेतन-भत्तों मिल रहे थे। 2007 के पीजीआई एक्ट में इस व्यवस्था को वधानिक मान्यता भी मिल गई थी। इसके बावजूद छठे वेतन आयोग की सिफारिशों को लागू करने का वक्त आया तो वित्त विभाग ने खर्च बचाने के लिए खेल कर दिया। वित्त विभाग ने तय किया कि पीजीआई में पुनरीक्षित वेतन संरचना में वेतन निर्धारण की प्रक्रिया वही होगी जो राजकीय कर्मचारियों के लिए निर्धारित है।

जैसा कि पीजीइआई के फैक्लटी फोरम के अध्यक्ष डा. पीके सिंह बताते हैं राजकीय चिकित्सकों के लिए एनपीए 1200 रुपए है जबकि पीजीआई में एनपीए बेसिक वेतन का 25 प्रतिशत है। उस पर डीए अलग से मिलता है। ज्यादातर राजकीय चिकित्सक एनपीए लेने के बावजूद प्राइवेट प्रैक्टिस में लिप्त हैं जबकि पीजीआई में प्राइवेट प्रैक्टिस के उदाहरण नहीं मिलते। ऐसे में पीजीआई चिकित्सकों को राजकीय चिकित्सकों के समकक्ष रखना संस्थान को नागवार गुजरा। वह हड़ताल पर चले गए।

अचानक हुई इस हड़ताल से सरकार भी सख्त हो गई। राज्य सरकार ने साफ कह दिया कि जब तक हड़ताल नहीं वापस होगी कर्मचारियों से कोई बात नहीं होगी। दो पक्ष जिद पर अड़ गए। लेकिन इसी बीच इस लड़ाई में यूपी कांग्रेस कूद पड़ी। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष रीता बहुगुणा जोशी दिल्ली में थीं। वह अमौसी हवाई अड्डे से सीधे पीजीआई पहुँच गईं। फिर वह कर्मचारियों को लेकर राज्यपाल टीवी राजेस्वर से मिलीं। पीजीआई नर्सिग एसोसिएशन के अध्यक्ष अजय सिंह कहते हैं कि कोई क्षेत्रीय विधायक यहाँ झँकने तक नहीं आया। श्रीमती जोशी न आती तो यह मामला इतनी जल्दी निपटने वाला नहीं था।

हड़ताल पर राजनीतिक रंग चढ़ता देख राज्य सरकार तत्काल हरकत में आई। खुद चिकित्सा शिक्षा मंत्री ने आश्वस्त किया तब हड़ताल खत्म हुई। सूत्र बताते हैं कि राज्य सरकार भी अपने स्तर पर इसकी जवावदेही तय कर रही है। चिकित्सा शिक्षा विभाग के आधिकारिक सूत्रों ने बताया कि वित्त विभाग शासनादेश में संशोधन कर रहा है।

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  • Web Title:राजनीति दबाव ने भी सुलझई पीजीआई की पहेली