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मानवाधिकार के चिकित्सक

मानवाधिकार के चिकित्सक

सरकार की जुबान में बिनायक सेन नक्सली हैं। आतंकी हैं। देश को उनसे खतरा है। इसीलिये छत्तीसगढ़ सरकार ने उन्हें दो साल पहले गिरफ्तार कर लिया था। सेन पेशे से डॉक्टर हैं। जन स्वास्थ्य वैज्ञानिक हैं। मानवाधिकारों के उल्लंघन होने पर उनके खिलाफ लड़ते हैं। जंगलों में रहने वाले आदिवासियों के स्वास्थ्य का ख्याल रखते हैं।

आदिवासियों को शराब और पारिवारिक हिंसा से मुक्ति के अभियान से जुड़े हैं। ये हैं विनायक सेन पर आरोप। यही है उनकी चाजर्शीट। दुनिया के दबाव और तमाम संघर्षो के बाद अंतत: 25 मई 2009 को सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें जमानत में छोड़ ही दिया। दो साल की कैद में पुलिस ने सेन के परिवार को हर तरह से परेशान किया।

उनके घर में छापा मारा। लेकिन कुछ भी विवादास्पद सामग्री नहीं मिली। पुलिस उनके कंप्यूटर को उठा ले गई। बाद में हैदराबाद की फोरेन्सिक लैब ने कंप्यूटर में भी ऐसा-वसा कुछ नहीं पाया। तमाम मशक्कत के बाद पुलिस ने उन पर आरोप लगाया कि वे नक्सलियों के बीच संदेशवाहक का काम करते थे।

लगभग साठ वर्षीय सेन लंबे समय से छत्तीसगढ़ के आदिवासियों और गरीबों के बीच उनके स्वास्थ्य को लेकर काम कर रहे हैं। जो काम स्टेट को करना चाहिये वे उसे अंजम दे रहे हैं। वह भी ऐसे आदिवासी बीहड़ इलाकों में जहां आसानी से पहुंचना मुश्किल है।

उनकी गिरफ्तारी के समय पूरी दुनिया ने उनके साथ एकजुटता दिखाई। एमनेस्टी इंटरनेशनल जसी संस्थाओं ने उनकी गिरफ्तारी को गैर कानूनी कहा। दुनिया के बाइस नोबल पुरस्कार विजेताओं ने भारत के राष्ट्रपति से उनको छोड़ने की अपील की। नोबल पुरस्कार विजेता नामचामस्की, अर्मत्य सेन, मैगसेसे पुरस्कार विजेता अरुण सेन और फिल्मकार श्याम बेनेगल ने सेन की रिहाई के लिये सरकार पर जबर्दस्त दबाव बनाया। इस दौरान उनकी पत्नी इलिना सेन ने भी सेन की रिहाई के लिये हर दरवाज खटखटाया। सेन और उनकी पत्नी ने रुपांतर नाम का एक एनजीओ बना रखा है।

रुपांतर में सामुदायिक स्वास्थ्य के लिये कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षण दिया जता है, जो बाद में आदिवासी इलाकों के बीस गांवों में तैनात किये जते हैं। ये कार्यकर्ता शराबखोरी, घरेलू हिंसा और खाद्य सुरक्षा के क्षेत्र में भी काम करते हैं। सेन ने छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा के शहीद अस्पताल की स्थापना में अहम भूमिका अदा की है। आदिवासियों के बीच ये अस्पताल जीवन-रेखा की तरह है।

सेन जन स्वास्थ्य सहयोग के भी सलाहकार हैं। यह संस्था बिलासपुर के आदिवासी इलाके में सस्ते में स्वास्थ्य सेवा उपलब्ध कराने का काम करती है। इसके अलावा वे राज्य की तमाम स्वास्थ्य से जुड़ी संस्थाओं से जुड़े हैं, जो गरीबों को स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराती हैं। छत्तीसगढ़ पीपुल्स यूनियन ऑफ सिविल लिबर्टीस के सेन महासचिव हैं। नक्सली के नाम पर इलाके में पुलिस द्वारा मारे जने वाले बेगुनाह लोगों के खिलाफ वे इसी संस्था के माध्यम से संघर्ष करते हैं।

तमाम महत्वपूर्ण पुलिस एनकाउन्टर की फैक्ट फाइंड टीम के वे सदस्य रहे हैं। सेन के काम को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता मिली हुई है। सेन को 2008 में ग्लोबल हेल्थ और हयूमन राइट्स की रक्षा के लिये दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण पुरस्कार के लिये चुना गया। ग्लोबल हेल्थ काउन्सिल के इस पुरस्कार के अभिनंदन पत्र में सेन के बारे में लिखा है कि उन्होंने हजरों गरीबों के स्वास्थ्य की रक्षा की और उनमें अपने अधिकारों के प्रति जगरुकता पैदा की। वे किसी भी हालत में किसी भी सरकार के लिये खतरा नहीं हो सकते हैं।

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