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विकास की उलटबासिया और संप्रग-2 का एक्शन रिप्ले

इस मायने में मनमोहन सिंह मुकद्दर के सिकंदर निकले कि चुनावी छलनी में छन कर उनकी पिछली 29 सदस्यीय कैबिनेट से लालू, पासवान या रामदौस जसे विवादित नेता खुद बाहर निकल गए और मंत्रिमंडल का लगभग आधा (नाकारा) हिस्सा नई शुरुआत के इच्छुक युवा भारतीय मतदाता ने ही मिटा दिया।

लेकिन पहली खेप में मंत्रिमंडल में शामिल किए गए कथित नए लोगों में भी ममता, मोइली अथवा एस. एम. कृष्णा भी राजनीति के पुराने लोग ही हैं। महिमामय मंत्रालयों के कर्णधारों की औसत उम्र भी पचास से ऊपर ही ठहरती है। संदेश साफ है : संप्रग-2 का मुख्य बल तारतम्य बनाए रखने पर है, बदलाव पर नहीं। क्या सरकार का सौ दिनी अजंडा आगे स्थिति को बदलेगा?

सौ दिनों में भारत जसे विशाल देश की अर्थव्यवस्था या समाज का कितना विकास कर लिया जएगा, इस पर अधिक माथापच्ची करना बेकार है। वित्तीय स्थिति तो यू भी सुधर रही है, और अगर 100 दिन में सूचकांक ऊपर उठे तो भी बहुत करके मसल वही होगी कि घी बनाई ताहरी औ’ बड़ी बहू का नाम।़ दूरगामी चिंता की बात यह है कि इस बार मनमोहन सिंह की सरकार को जहा मतदाताओं ने नाकारा मंत्रियों और आपराधिक रिकार्ड वाले सांसदों से मुक्ित दिलाई, खुद सरकार ने अपेक्षित कठोरता से द्रमुक को बालू और राज की कुख्यात भ्रष्टाचारी जोड़ी समेत कैबिनेट के मलाईदार पदों पर अड़ने से नहीं रोका।

क्या यह भी अजब नहीं लगता कि केन्द्रीय सत्ता तो दिल्ली में गाजेबाजे के साथ नए सेक्युलर, जति निरपेक्ष विकास का समाजवादी अजेंडा सामने रख रही है, लेकिन मंत्रिमंडल गठन जतीय-क्षेत्रीय आधारों पर हो रहा है। और अर्थतंत्र जो है उसे भी दिल्ली की बजए आर्थिक तौर से सबल प्रांतीय राजधानियों चेन्नई, अहमदाबाद, मुंबई, बंगलोर तथा हैदराबाद से पूजीवाद का पेट्रोल मिलता रहा है।

दिल्ली की समाजवादी तेवर वाली सौम्य विकासप्रेमी बादशाहत के पेट से मुंबई, बंगलोर, हैदराबाद का तेज तर्रार पूजीवाद कैसे निकला? क्यों कोलकाता और तिरुअनंतपुरम् जसी राजधानिया अधिक जनवादी और दिल्ली-मुंबई से कहीं बेहतर शिक्षा सूचकांकों के बावजूद आर्थिक तौर से पिछड़ी और बहुराष्ट्रीय कंपनियों तथा विदेशी निवेश के लिए अयोग्य बनी रहीं? न्यूनतम कन्या अनुपात और सांप्रदायिक दंगों तथा राजकीय भ्रष्टाचार के बावजूद गुजरात, दिल्ली और पंजब भौतिक विकास के पैमानों पर लगातार कैसे उठते चले गए? यह जटिल सवाल हैं।

डॉ. रामविलास शर्मा ने भक्ित आंदोलन और तत्कालीन राज-समाज के सिलसिले में सूर, तुलसी और कबीर को लेकर कभी एक बहुत महत्वपूर्ण बात कही थी, जो इन सवालों के जवाब से भी जुड़ती है।डॉ. शर्मा के अनुसार मध्यकालीन समाज भी एकसार नहीं था। हमारा समाज कई खाचों में बटा, और कई जटिल बंधनों से जुड़ा हुआ है। सूर पशुचारण क्षेत्र के हैं, उन्होंने पशुपालकों और उनके समाज पर लिखा। तुलसी किसानों से मजबूती से जुड़े थे, वे खेती और गाव के कवि बने। और काशी के कबीर एक तीसरे (शहरी) वर्ग के प्रवक्ता थे।

काशी में एक वर्ग पंडितों का था, तो दूसरा (प्राय: असवर्ण) कारीगरों (जसे बुनकर) का, जो व्यापारी वर्ग के लिए माल पैदा करता था। सामंत शहर गाव को जोड़ते और दोनों से लगान और कर वसूलते थे। यह तीनों क्षेत्र आज के भारत में भी मौजूद हैं, और आज भी वे अलग-अलग काम भी करते हैं और एक ही सत्ता को कर भी चुकाते हैं।

अत: आज भी राज-समाज को सचमुच सुधारना हो, तो यांत्रिक ढंग से सोचने की बजए हमें उसके ऐसे ठोस भौतिक क्षेत्रों पर विचार करना होगा जो एक साथ सामंतवादी भी हैं और समाजवादी भी। पर इन दोनों स्तरों पर भी कुछ भीतरी विभाजन हैं।

इस तरह इक्कीसवीं सदी के भारत में राज्यसत्ता (वह राजग के हाथ में हो अथवा संप्रग के) न तो पश्चिमी पैमानों की विशुद्ध पूजीवादी सत्ता है, और न ही साम्यवादी र्ढे की समाजवादी! 16वीं, 17वीं सदी के मुगल साम्राज्य में भी राज्यसत्ता एक ओर तो व्यापारी वर्ग से कर लेती थी, पर साथ ही भारत सरकार की तरह खुद भी व्यापार में सीधे भागीदारी करती थी, और वणिज-व्यापार के क्षेत्र की बहुत सारी चीजों की लगाम बादशाह हाथ में ही रखते थे।

उदाहरण के लिए अकबर के वक्त में देशी और विदेशी व्यापारी और बनिए जो बड़े धंधे चलाते रहे, उनमें कपड़ा निर्यात भी था। पर कपड़े के व्यापार का समग्र इजरा जोधाबाई के नाम पर रहा, जिन्हें कर लेने का हक था। इसी तरह जहागीर के वक्त में भी इत्रफरोशी और हस्तशिल्प (खासकर कढ़ाई-बूटेदारी में) जसे धंधों में नूरजहा का सीधा हस्तक्षेप रहा।

इस अजब भारतीय तरीके को (जिसमें सार्वजनिक समाजवाद और निजी पूजीवाद तथा कर लेने या कज्रमाफी के र्ढे बेतरह गड्डमड्ड हो जते हैं) हम समझ लें, तो हमारे लिए अपने सार्वजनिक क्षेत्र के तमाम उपक्रमों को अपने नियंत्रण से मुक्त करने तथा कृषि-लोन को लेकर भारत सरकार के विचित्र किस्म के द्वैत समझना कुछ आसान हो जएगा।

हम देख पाएंगे कि क्यों पूजी उगाहने को एक तरफ तो विनिवेश मंत्रालय बनाया जता है, पर फिर कई बीमार उपक्रम बेच कर जरूरी पूजी कमाने की बजए बाजर के तर्क के विपरीत जकर भी उन्हें जसे-तैसे जिलाए रखने के लिए जीवनरक्षक उपकरणों पर रख दिया जता है। करुणानिधि का कुनबा आई.टी. तथा परिवहन-यातायात, या लालू परिवार रेलवई को और पीएमके स्वास्थ्य कल्याण से जुड़े मंत्रालयों को पिछले पाच बरसों में लगभग एक घरेलू बपौती बनाकर क्यों बरतते रहे। और आगे भी क्यों बरतना चाहते हैं। लद्धड़ कार्यान्वयन के बावजूद सार्वजनिक विकास कार्यो के नाम पर लगातार निजी क्षेत्र पर हर बजट में कमरतोड़ कर ताथा आरक्षण कड़ाई से लागू कराना क्यों जरूरी है, यह उलटबासिया भी उपरोक्त संदर्भ में ही समझ में आती हैं।

हिचकिचाहटभरे आर्थिक सुधारों के दो अटपटे दशकों के दौरान इतना जरूर हो गया, कि निजी क्षेत्र के पूजीवादी उत्थान और फैलाव ने कई बढ़िया रोजगार के मौके गढ़े और युवाओं में सरकारी नौकरियों के प्रति उत्कट ललक को काफी हद तक घटा दिया। इससे उत्तर-मंडल काल में आरक्षण की मदद से उभरे पिछड़ों और मलाईदार तबके के दलितों को लोकतांत्रिक राज-समाज में हाथ पैर फैलाने की एक नई गुंजयश तथा आत्मविश्वास मिले। और इसकी चुनावी संभावनाओं ने राजस्थान के गूजर आंदोलन और बसपा तथा अजरुनसिंह के निजी क्षेत्र में आरक्षण की पेशकश को हवा दी।

अलबत्ता मीडिया ने बिना इस बात की बारीकी को समङो सतही तौर से दलित-गूजर मुद्दों को इतने जोरशोर से इतने मंचों पर बखान डाला, कि लोगों को लगने लगा जसे कि बस एक क्रांति हो गई और दबे-कुचलों के हक में उठे यह सुधारवादी राजनैतिक आंदोलन अब की बार चुनावों में भारतीय राज-समाज का आत्यंतिक कायाकल्प कर ही डालेंगे। चुनाव हुए तो यह तमाम भविष्यवाणिया पोच निकलीं।

क्योंकि असली परिस्थितियों से ऐसे सतही आंदोलनों का कोई गहरा रिश्ता नहीं था। मूलत: सर्वजनसमाज या गुजर्र आंदोलन जसे समीकरण लोकतांत्रिक राजनीति के भीतर विशेष जति समूहों के सामंतवादी दबंगई के विरूद्ध अल्पावधि विद्रोह थे,  जिनसे (निजी हितों के चलते) कुछेक सवर्ण शहरी समूह और शहरी परिधियों में बसे अर्धकिसानी गुट भी आ जुड़े थे। वृहत्तर किसानी या शहरी समाज इनसे अछूता रहा। व्यापारिक पूजीवाद अथवा अर्धसामंती वंशवादी राज्यसत्ता का तख्ता उलट सकें इतनी ताकत इन नाटकीय उभारों में नहीं थी, क्योंकि न तो उनका आधार चौड़ा था, और न ही जड़ें खास गहरी।

देश चलाने के लिए शीर्ष पर बैठे लोगों की पंक्ित में ऐसे स्त्री-पुरुषों की बहुतायत तो दिखनी ही चाहिए, जिनकी सोच और कार्यशली जनता में भरोसा जगाते हों। यहा चिंता का मुद्दा यह है, कि सरकार को यह बखूबी मालूम होते हुए भी, कि युवा मतदाताओं ने उन्हें इस बार स्थिरता और विकास लाने और जतिवाद तथा सांप्रदायिकता मिटाने के लिए सत्ता सौंपी है।

कार्यकुशलता की बजए कई अहम मंत्रालयों के आवंटन में भारतीय टोली का राजनैतिक (पारिवारिक) तुष्टीकरण भी कसौटी बना है जिसकी मदद से राज बाबू को पुन: आई.टी. मिल गया और अजगिरी को केमिकल तथा फर्टिलाइजर विभाग। राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार योजना के पूरे प्रसार के लिए जरूरी 53 हजर करोड़ की राशि कहा से आएगी, इसे लागू करने वाली मशीनरी में पैठे व्यापक भ्रष्टाचार पर कैसे रोक लगेगी? सामाजिक क्षेत्र में व्यापक विकास कार्यो के लिए जरूरी विशाल खर्चे-पानी का जुगाड़ कौन करेगा? थका हुआ निजी क्षेत्र या विनिवेश को नकार अरबों डकार चुका अनुत्पादक हो चला सार्वजनिक क्षेत्र? इन जरूरी प्रश्नों पर नए मंत्रियों की ओर से अभी कोई आश्वस्तिकारक स्पष्टीकरण नहीं आया है।

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