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ये दिल कैसे दे दूं?

सोलह मई की सुबह दस बजकर दस मिनट के बाद से ये दिलेनादां पूछता फिर रहा है : ये दिल किसको दूं? किसकी पूज अरचा करूं? इस दिल में उमड़ती श्रद्धा को किसके चरणों में निवेदित करूं? किसकी नवधाभगति करूं? सगुणोपासना करूं? किसे अपने मन का आदर्श कहूं? किसे देवता मानूं? किसे आदर्श कहूं?

इस लेखक का दिल पुरानी ¨हदी फिल्म के टाइटिल के बहाने नगरी-नगरी द्वारे-द्वारे पूछता फिर रहा है :ये दिल किसको दूं? माया बहन को तो अब नहीं ही देना है! कम से कम पांच साल तक तो नहीं सोचना है। बहन जी अज्ञेजी कह गए हैं : ये उपमान मैले हो गए हैं। देवता इन प्रतीकों के कर गए हैं कूच! हे पाठकजन! आपसे इस बेईमान दिल की किस-किस करनी की कहें?

सोलह मई की उस मनहूस सुबह से पहले तक हिसाब लगाता रहा कि माया बहन का तीसरा मोरचा अब आया कि तब आया और अपने दिन फिरे, बहन अपनी पश्चिमी यूपी की हैं। ¨लक निकल आएगा। उनके सोशल इंजीनिय¨रग का फायदा इस लेखक को भी नसीब होगा।

तिस पर अपने पुराने कामरेड लोग संग होंगे। लेकिन मुई सोलह मई ने तीसरे मोरचे को ही नहीं लात मारी, हमारे भाग का चूल्हा भी फोड़ दिया! ऐ सोलह मई के मनहूस दिन तूने सब कुछ बदल डाला। तेरे पहले तक यह अवसरप्रिय मन मुलायम-अमर-लालू-रामविलास के चतुमरुखी रूप को नित्य निहारता मुग्ध होता रहता और अपनी पुंश्चली Þाद्धा का चालीस फीसदी चौथे मोरचे के लुटाता रहता। लगता कि अब दिन बहुरेंगे।

ब्रजभाषी होने के नाते मुलायम जी सुध लेंगे एक दिन और ¨जदगी बन जएगी। लेकिन मुई सोलह मई ने घोर गरमी में आशाओं पर तुषारापात कर डाला। दिल देने लायक नहीं छोड़ा। आखिर आखिर तक ‘वह एक और मन रहा राम का जो न थका’ का जप करता हुआ अपना अंडरग्राउंड दिमाग ‘अगर कोई नहीं है तो आडवाणी ही सही’ वाली तर्ज पर आडवाणी जी को दिल देने की तैयारी कर ही रहा था कि इतिहास को यह भी गवारा न हुआ>

वहीदा रहमान ने ‘कागज के फूल’ में जो दर्द भरा नगमा गाया था वह गम की इस घड़ी में याद आया : ‘बक्त न किया क्या हसीं सितम,हम रहे न हम, तुम रहे ने तुम!’ तब इस घनघोर दुराशा दुष्ट दशा में इस अंधेरे में घोर संकट के इस प्रहर में अपना ये छटांक भर का चूहाचोर दिल किसे दूं? कौन है जिसे पूज्य मानूं?

जनता ने उन्हें न मंदिर दिया, न मंदिर का ओसारा दिया। ऐसी बेकार जनता ने एक लेखक के संग वही किया जो एक बेतुकी जनता कर सकती है। ऐ बेतुकी जनता जरा देख तो इतने रथी-महारथी, इतने बाहुबली, इतने वाक्बली, इतने ताक बली, इतने छली, इतने वीर बहादुर इतने-इतने पराक्रमी सब के सब कागजी पहलवानों की तरह उड़ गए। लेकिन अपना बेशर्म दिल है कि मानता नहीं है इतनी मार खाने के बाद भी पूछता है : कस्मै देवाय? किसको? ममता दी को?

पंडितजी कहा करते थे न कि पिछले जन्म के कर्म सामने आते हैं न। अब सोच- न वामपंथी होता न परेशान होता। ममता शरणम गच्छामि हो जता! यह सत्ता विरहित मन हर्षा जता। ऐसे में करुणानिधि-दयानिधि की याद आना स्वाभाविक है। आ रही है, सोचता हूं कि इधर की दिल की लुटिया उड़ेल दूं।लेकिन ¨हदी वाला हूं। इनसे कैसे निभेगी? तो यह रास्ता भी बंद है।

शरद पवार या अपने पुराने मित्र डीपीटी को शायद दिया ज सकता है। यो फारुख-उमर अब्दुल्ला बुरे नहीं। तभी दिल कहता है तू बावला है, पंजी -स्सी पर मरता है और अरे अगर देना ही है तो जो सबका दाता है उसे दे? अगर उसकी झड़न फटकन भी पल्ले पड़ गई तो तेरे नसीब बन जएंगे। मन हुआ कि मनमोहन को दे दूं! नाम मनमोहन! काम मनमोहन! दाम मनमोहन! तिस पर भौत बड्डा अर्थशास्त्री। चोखा। चंगा बंदा! साफसुथरा।

लेकिन तब सोनिया जी को क्यों न जपूं? वे बहुत बिजी तो राहुल भैया तो कहीं गए नहीं हैं। खुले दिल वाले हैं। वे जरूर मेरे इस खुले दिल के नैवेद्य को स्वीकार करेंगे। युवा लोगों को चाहते हैं। ¨हदी के सारे साहित्यकार चिर युवा होते हैं। जिन्हें उम्र बूढ़ा दिखाती है वे अस्सी-पिचासी के पार होकर भी गोदरेज हेयर डाई संडे के संडे लगाकर ‘चिर युवा’ बने रहते हैं।

राहुल भैया! ¨हदी साहित्य में कोई खुद को किसी लड़की से अंकल तक कहलाना तक पसंद नहीं करता ¨हदी का अस्सीसाला भी युवा भाव की कविता कहानी लिखा करता है। युवाओं का युवा होता है वह। आप इनका न भूलना जी! इनमें भी इस चिर ¨बदास को न भूलना जी! आपसे कुछ खास नहीं चाहिए। एक पद्मÞाी एक ठो पद्म भूषण विभूषण और मरने से पहले एक सीट राज्य सभा की! आप कहें तो आपके आपकी सरकार के बधाए गाना शुरू कर दूं। बस आपके संकेत की देर है।

बॉस एक बार संकेत दे देना और फिर देखना कि यह कलम राणा के घोड़े चेतक की तरह आपकी सेवा में लग जएगी। राणा की पुतली फिरी नहीं तब तक चेतक मुड़ जता था! आपके कृपाकटाक्ष का आकांक्षी,

एक फटीचर ¨बदास दिलवाला

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