DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

चैनलों के क्षेत्रीय बनने का समय

सरकारें जनता चुनती है। जिन्हें कुछ न कुछ करने का दिखावा करना पड़ता है और जब साधारण जनादेश हो तो उन्हें दिखावे से ज्यादा ही करना होता है। उन्हें देश के शासन की आवश्यक प्राथमिकताओं की सूची सार्वजनिक करनी पड़ती है और यह घोषणाएं भी करते रहना पड़ता है कि वे इन चुनौतियों का कैसे सामना करेंगे। वे इसलिए जवाबदेह होते हैं कि वे अपने शासन करने की भूमिका का निर्वाह सार्वजनिक संपत्ति के माध्यम से करते हैं।

मीडिया के दिग्गज इसलिए नहीं होते कि वे शासक वर्ग पर फैसले सुनाएं। या कि कौन सी सूचनाएं देनी हैं यह तय कर सार्वजनिक मुद्दों का निर्धारण करें। वे एक व्यावसायिक आधार पर काम करते हुए एक सार्वजनिक भू्ंमिका अपनाते हैं। विशुद्ध व्यावसायिक तर्क के साथ उनके काम से एक लोक सेवा का आयाम जुड़ा हुआ है। उन्हें जिस चीज से मान्यता मिलती है वह मतपत्र नहीं बल्कि अखबार का प्रसार और टीवी की रेटिंग है।

मीडिया घराने ऐसे लोगों को नौकरी पर रखते हैं जो इन  सभी भूमिकाओं का निर्वहन करते हैं। अगर टेलीविजन की बात करें तो इसमें परफारमर (यानी जो भावुकता पैदा करता है, टेलीप्रोमोटर से मोटी बातें पढ़ता है और दिन की बड़ी खबरें प्रस्तावित करता है), स्टेनोग्राफर(सार्वजनिक महत्व के लोग जो कहते हैं उस बात को जनता तक पहुंचाने वाले) और शोधकर्ता (जो दफ्तरों के बाहर निकल कर शहर में जते हैं और जनता से बात कर सूचनाएं इकट्ठा करते हैं) जसे लोग शामिल हैं।

पहली भू्मिका के लिए मीडिया घराने को एक एंकर के वेतन  का मूल्य ही चुकाना होता है क्योंकि वह व्यक्ित स्टूडियो के भीतर से काम करता है। लेकिन यह माध्यम इस तरह का है कि वही परफारमर खबरों के लिए बेचैन जनता को चैनल की तरफ खींचता है। इसीलिए यह भूमिका करने वाले को भारी राशि दी जती है। दूसरी भूमिका के लिए प्रिट या टीवी में रिपोर्टर की नियुक्ित की जती है और उन्हें सार्वजनिक स्थलों पर तैनात किया जता है। किसी भाषण या बहस पर रिपोर्ट करते हुए वे एक स्टेनोग्राफर की ही भूमिका निभाते हैं।

मीडिया कर्मियों की तीसरी Þोणी उन लोगों की होती है जो ज्यादातर वित्तीय प्रारूप को अनिवार्य बनाते हैं पर यह काम कभी-कभार का होता है। यहां ज्यादातर का प्रयोग इसलिए भी किया गया है क्योंकि भारत एक छोटा, सरल और युक्ितसंगत आबादी वाला देश नहीं है बल्कि वह इसके विपरीत है। प्रशासन किस तरह से काम कर रहा है और लोगों की क्या समस्याएं हैं इसे पता करने के यु्क्ितसंगत काम के लिए रिपोर्टरों को इलाके के शोधकर्ता की भूमिका अपनानी पड़ती है और वे व्यापक तौर पर यात्रा करते हैं और सिर्फ नेताओं के भाषण नहीं सुनते, लोगों से संवाद भी करते हैं।

पत्रकारिता का यह स्तर जितनी अच्छी तरह काम करता है, मीडिया उतनी ही अच्छी तरह से और निष्ठापूर्वक अपनी सार्वजनिक भूमिका का निर्वाह करता है। चुनाव के समय मीडिया की यह भूमिका विशेष महत्व हासिल कर लेती है। लेकिन इन कामों को करने में मीडिया कंपनी को काफी खर्च उठाना पड़ता है। फिर जिस प्रकार टेलीविजन के दर्शकों की सनसनीखेज और चटपटी खबरें देखने की मानसिकता है उसके मद्देनजर इस निवेश से टेलीविजन की रेटिंग नहीं बढ़ने वाली है। हां इससे एक हद तक अखबार के पाठकों की  संख्या पर जरूर असर पड़ता है क्योंकि उनकी मांग टेलीविजन के दर्शकों से अलग है। लेकिन दोनों स्थितियों में आप चुनाव के कवरेज पर जितना धन खर्च करेंगे आप की विज्ञापन पर निर्भरता उतनी ही बढ़ती जती है।

इसलिए यह आश्चर्य करने वाली बात नहीं है कि हमारे टेलीविजन चैनलों ने मीडिया की जो भूमिका अपनाई है वह व्यापक रूप से स्टूडियो पर निर्भर हो कर रह गई है। दूसरी भूमिका स्टेनोग्राफर या रिपोर्टर स्टूडियो के काम में अपना योगदान दिया है। तीसरी भूमिका एक शोधकर्ता की है जोचुनाव विश्लेषकों और सिविल सोसायटी के पहरेदारों पर छोड़ दी गई है। जसे कि नेशनल इलेक्शन वाचडाग ने इस आम चुनाव में हमें ऐसी कई चीजें बताईं जिसे बताने की जहमत मीडिया ने नहीं उठाई।

चुनाव और सरकार निर्माण पर समाचार जुटाने और प्रस्तुत करने की जगह चर्चा हावी होती ज रही है। इन चर्चाओं में कयास शामिल होते हैं। अगर आप आधा घंटा ध्यान से अखबार पढ़ लें तो आप को देश और दुनिया के बारे में ज्यादा सूचनाएं मिल जएंगी। सवाल है कि अगर टेलीविजन समाचार वह माध्यम है जो ज्यादातर लोगों तक पहुंचता है जिसमें निरक्षर लोग भी शामिल हैं और इसकी रिपोर्टिग का तरीका इतना दोषपूर्ण है तो विकल्प क्या है?

एक विकल्प टेलीविजन समाचार का और क्षेत्रीयकरण है । आज ऐसे समाचार चैनल की जरूरत है जो देश के विभिन्न हिस्सों के समाचार देकर मुकम्मल तस्वीर बनाए क्योंकि जब भी मैं हिंदी इलाके के समाचार चैनल देखती हूं, पूवरेत्तर के सैटेलाइट चैनल देखती हूं या पश्चिम बंगाल का आनंद चैनल देखती हूं तो मुङो बाकी भारत के बारे में ज्यादा वास्तविक समाचार मिलते हैं।

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:चैनलों के क्षेत्रीय बनने का समय