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विधानसभा भंग होने के आसार बढ़े

पिछले साढ़े चार महीने से निलंबित चल रही राज्य की विधानसभा जून के प्रथम सप्ताह में भंग हो सकती है। इसके लिए दिल्ली से लेकर रांची तक ताना-बाना बुना जाने लगा है। राज्यपाल सैयद सिब्ते रजी की यहां गुरुवार को विस अध्यक्ष आलमगीर आलम से मुलाकात को इसी से जोड़कर देखा जा रहा है। समझा जाता है कि जल्द ही राज्यपाल विधानसभा भंग करने की सिफारिश केंद्र को भेज देंगे।

इस बीच विस अध्यक्ष से राज्यपाल की ताजा भेंट को भले ही शिष्टाचार मुलाकात बताया गया, लेकिन सूत्रों के हिसाब से दोनों के बीच विस्तृत चर्चा के बाद राज्य में सरकार बनने की संभावनाओं को खारिज कर दिया गया है। साथ ही मौजूदा विधायकों की पेंचदार दलीय स्थिति और 'हार्स ट्रेडिंग' की अत्यधिक संभावना को देखते हुए विधानसभा भंग कर नए चुनाव कराने को ही आदर्श स्थिति माना गया। वैसे भी लोकसभा चुनाव के दौरान यूपीए में हुई फूट, कांग्रेस की राजद से खटास और निर्दल विधायकों से बढ़ी दूरी को देखते हुए यूपीए फोल्डर से सरकार बनने की संभावना नहीं है।

जबकि, एनडीए के तीन विधायक जहां सांसद बन चुके हैं, वहीं भाजपा पहले से ही विधानसभा भंग कर नए चुनाव कराने का दबाव बना रही है। लिहाजा, उसकी तरफ से भी सरकार बनाने की किसी कोशिश की संभावना दूर-दूर तक नजर नहीं आती। उधर, कांग्रेस अब यहां और कोई प्रयोग करना नहीं चाहती। वह जानती है कि यदि सरकार बनाने की कोशिश हुई, तो इससे जहां किरकिरी होगी, वहीं बहुमत का जादुई आंकड़ा जुटाना बेहद कठिन है। यदि इसके लिए कोई इंतजाम किया भी जाए तो राज्य सरकार में कांग्रेस का नेतृत्व झामुमो को कभी स्वीकार नहीं होगा और झामुमो का नेतृत्व कांग्रेस को पसंद नहीं। सो, अब चुनाव ही एकमात्र विकल्प है। इन्हीं सब बातों को देखते हुए कांग्रेस हाईकमान ने विधानसभा भंग करने का मन बना लिया है। सूत्रों की मानें तो इसके लिए राज्यपाल को जल्द से जल्द विधायी कोरम पूरा करने को कहा गया है। ताकि पहली जून से प्रस्तावित पंद्रहवीं लोकसभा के सत्र में इसे मंजूरी दिला खेल खत्म किया जा सके।

पर, कांग्रेस नहीं चाहती कि विधानसभा चुनाव तत्काल हो। क्योंकि, लोकसभा चुनाव में उसे झारखंड से जहां पांच सीटें गंवानी पड़ी, वहीं सहयोगी दल झामुमो की झोली से भी दो सीट चली गई। यह सब निर्दल मधु कोड़ा और बाद में झामुमो प्रमुख शिबू सोरेन के नेतृत्व में बनी राज्य सरकारों की खराब छवि के कारण हुआ। आगे इस वर्ष 19 जनवरी से राज्य में लागू राष्ट्रपति शासन में भी खास कुछ नहीं किया जा सका। इसमें करीब ढाई-तीन महीने आदर्श चुनाव आचार संहिता की भेंट चढ़ गए, जबकि शेष समय राज्यपाल पहले से बिगड़ी प्रशासनिक मशीनरी को दुरुस्त करने में उलझे रहे, जो अब तक पटरी पर नहीं आ सकी है। सो, कांग्रेस चाहती है कि विधानसभा भंग कर 19 जुलाई को समाप्त हो रहे राष्ट्रपति शासन के कार्यकाल को एक बार और अवधि विस्तार दिया जाए। फिर तेजी से विकास कार्य करते हुए यहां पार्टी के पक्ष में माहौल बने। साथ ही विधानसभा चुनाव के दौरान संभावित गठजोड़ को ध्यान में रख सक्षम और ईमानदार सहयोगी की तलाश के लिए वक्त मिल सके। इन्हीं सब संभावनाओं के मद्देनजर विधानसभा को भंग किया जा सकता है।

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