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बुरा मानो या भला : चुनावों का पोस्टमार्टम

आखिरकार आम चुनावों में यूपीए को जबर्दस्त जीत मिल ही गई। मुङो लगता है उस जीत के पीछे तीन वजह रहीं। पहली और सबसे बड़ी वजह तो मनमोहन सिंह के तौर पर काबिल और ईमानदार प्रधानमंत्री का होना था। दूसरी वजह उनका चुनाव प्रचार था। सोनिया गांधी, राहुल गांधी और दिग्विजय सिंह ने आम आदमी के मुद्दों को बेहतरीन ढंग से उठाया था। उन्होंने विरोधी दलों पर बेवजह हमला करने की कोशिश भी नहीं की थी। तीसरी और आखिरी वजह विरोधी पार्टियों का लोगों के मूड को न भांप पाना था। खासतौर नई पीढ़ी  का, जो पहली बार वोट कर रही थी।

विपक्ष के प्रधानमंत्री पद के दावेदार लालकृष्ण आडवाणी और उनके मुख्य चुनावी मैनेजर अरुण जेटली लोगों को सिर्फ यह समझने की कोशिश कर रहे थे कि मनमोहन सिंह निकम्मे हैं। आडवाणी के निकम्मा तकिया कलाम को लोगों ने सिरे से नकार दिया। ये लोग लगातार आरोप लगा रहे थे कि सरकार प्रधानमंत्री के घर 7, रेसकोर्स रोड से नहीं चल रही। उसे तो सोनिया के घर 10, जनपथ से चलाया ज रहा है। लोगों ने इसे भी नहीं माना। उनका भरोसा था कि सरकार तो रायसीना हिल पर बने साउथ ब्लॉक से ही चलाई ज रही है।

माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव प्रकाश कराट ने वाम पार्टियों को हराने में खास भूमिका निभाई। उनके दो मजबूत राज्य बंगाल और केरल रहे हैं। दोनों में पार्टी ने गिरावट देखी। उनकी नेतागीरी से समाजवादी आंदोलन को झटका लगा। लिहाज कांग्रेस मजबूत हुई। मुङो पूरा भरोसा है कि पोलित ब्यूरो के मुखिया के तौर पर उनके दिन गिने-चुने हैं। इन चुनावों में कुछ क्षेत्रीय नेताओं का बुरा हाल हुआ।

मायावती ने तो खुद को प्रधानमंत्री पद का दावेदार घोषित कर दिया था। वह अपने अहंकार में ही मारी गईं। उन्होंने संगमरमर के बुत लगवाने और बाग बनवाने में ही सरकार का पैसा बहाया। ये बुत और बाग खुद उनके थे। उनके मान्यवर और डॉ. आंबेडकर के थे। उन्होंने सड़क, स्कूल और अस्पतालों को बनवाने का खयाल ही नहीं किया। उनके बेईमान सलाहकारों ने उन्हें रोकने की कोशिश नहीं की कि इस सबसे उनकी बदनामी हो रही है। आखिर दलित और गरीबों के नाम पर आई थीं वह।

लालू यादव खुद अपनी मसखरी का शिकार हो गए। जयललिता की भी बेहाली हुई। उनकी अन्ना द्रमुक का जो हाल हुआ, उसकी उम्मीद न तो जयललिता को थी और न ही जनकारों को। केंद्र में सत्ता की सौदेबाजी करने का मौका ही नहीं मिला उन्हें। शरद पवार काफी समीकरण बिठाते हुए कांग्रेस के पार्टनर बने थे। प्रधानमंत्री पद की अपनी हसरत को छिपा नहीं पाए थे वह। कम से कम पांच साल के लिए अब उनकी इच्छा बर्फ में लग गई है। हम यहां से कहां जएंगे? अब तो यूपीए के रास्ते में छोटी-मोटी रुकावटें नहीं हैं? क्या अब सरकार एक नए एजेंडे पर काम करेगी? हमें यह उम्मीद तो करनी ही चाहिए।

लिखने की वजह

लिखने का असल मकसद क्या है? चाहे कविता हो या कोई लेख, लिखने का मतलब ही अपनी बात लोगों तक पहुंचाना होता है। अगर लेखक अपनी बात पाठकों तक नहीं पहुंचा पाता है, तो उसका मिशन ही गड़बड़ा जता है। मेरे खयाल से यह शायरी या कविता पर ज्यादा लागू होता है। वजह यह है कि उसकी लय बनाए रखने के लिए वे व्याकरण से खूब मनमानी करते हैं। लेकिन शायरी में भी शायर को पाठक से पार नहीं चले जना चाहिए। यानी उसकी परवाह तो करनी ही चाहिए। आधुनिक शायरी में ऐसा अक्सर होता है। वे पाठक की समझ से परे ही होती है। उसे पढ़ना सिर धुनने जसा होता है।

कुछ दिक्कतों के साथ मैं टी. एस. इलियट और डिलन टॉमस को तो पढ़ या समझ लेता हूं। लेकिन मुङो कभी एजरा पाउंड समझ में नहीं आए। हिंदुस्तानी शायर भी कोई अछूते नहीं हैं। मैं पंजबी, हिंदी और उर्दू शायरों को पढ़ता रहता हूं। मिज्र गालिब मेरे पसंदीदा शायर हैं। लेकिन कभी-कभी वह समझ में नहीं भी आते। अपने से ज्यादा जनकार लोगों से मैं उस बारे में पूछता भी रहता हूं। मैं अकेला गालिब का चहेता नहीं हूं, जिसे वह परेशान करते हैं। मेरे दोस्त आबिद सईद खान ने गालिब के ही वक्त के नवाब आगा खान अश्क का एक शेर ोज है। गालिब पर क्या फरमाया है उन्होंने!

अगर अपना कहा तुम आप ही समङो, तो क्या समझे?
मजा कहने का तब है, जब एक कहे, दूसरा समझे।
जुबा मीर लिखे और कलाम सौदा समझे।
मगर इनका कहा ये आप समझे या खुदा समझे।।

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