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हे गंगा मैया ..

गंगा दशहरा का समय चल रहा है। जेठ के शुक्ल पक्ष में पहले  दस दिन गंगा को ही समर्पित होते हैं। माना जाता है कि दशमी के दिन ही गंगा धरती पर आई थीं। इसीलिए यह समाज उनकी कृतज्ञता में पूरे दस दिन उत्सव मनाता है। कभी सोचता हूं कि मां गंगा ने धरती पर आने का क्या समय चुना था? जेठ की तपती दोपहरी में वह आई थीं। साल के जिस पड़ाव पर पानी की सबसे ज्यादा जरूरत महसूस होती है, उसी समय आई थीं मां गंगा।

नदी को हम मां के तौर पर देखते हैं। हमारी जिंदगी में मां ही तो इतना कुछ दे सकती है। और जो दे सकती है वही देवी होती है। इसीलिए हम नदी को देवी मानते हैं। गंगा के बिना तो हम अपने समाज की कल्पना भी नहीं कर सकते। हम उन्हें गंगा मैया कहते हैं। उनका मां का रूप ही हमने अपने दिलों में बसाया है। भगीरथ ने स्वर्ग में बसी गंगा को धरती पर आने के लिए मना तो लिया था। लेकिन उस समय वह एक लरजती, गरजती, अल्हड़ नदी थीं। उन्हें मां बना कर ोज था महादेव ने। कुछ कसर रह गई थी, तो उसे जह्नू षि ने पूरा कर दिया था।

अपने स्वर्ग को छोड़ कर धरती पर चली आई थीं वह। स्वर्ग के लिए तो शायद उनका अल्हड़पन ठीक होगा, लेकिन धरती के लिए वह ठीक नहीं था। धरती के लिए तो मां गंगा की ही जरूरत थी। वह गंगा जो हम तपते हुए लोगों को तृप्त कर सके। अपने प्रवाह में हमारे सारे पापों को बहा कर ले जए।

स्वामी विवेकानंद अपने साथ हमेशा गंगाजल रखते थे। वह मानते थे कि गीता और गंगा जल हिंदुओ का हिंदुत्व है। विदेश में जब भी वह बेचैनी महसूस करते थे, तो गंगाजल पी लेते थे। उनका मानना था कि पश्चिमी सयता के पेरिस, लंदन, न्यूयॉर्क, बर्लिन, रोम सब मिट सकते हैं, लेकिन गंगा का अस्तित्व नहीं। यों ही नहीं यह समाज गंगा जल के साथ जीना चाहता है। उसीके आखिरी घूंट के साथ मरना चाहता है। हे मां, जिंदगी की तपती दोपहरी में अपनी शीतल गोद देती रहो। और अपने प्रवाह की तरह हमारी जिंदगी को भी प्रवाहित करती रहो।

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