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सरहुल शोभायात्रा में उमड़ा जनसैलाब

राज्य की एक तिहाई आदिवासी आबादी ने रविवार को धूमधाम से प्रकृति पूजा का महापर्व सरहुल मनाया। राजधानी में भव्य शोभायात्रा निकाली गयी। पूजा के बाद मुख्य शोभायात्रा एक बजे हातमा से सिरमटोली सरना स्थल के लिए निकली। इस बीच रांची के तमाम टोले-मोहल्लों और आसपास के इलाकों से निकाली गयी शोभायात्रा भी मुख्य शोभायात्रा में जुड़ती चली गयीं। इसमें शामिल धोती-गंजी में सजे आदिवासी पुरुष और लाल-सफेद साड़ी पहनी महिलाओं के चेहर पसीने की बूंदों और पर्व के उल्लास से दमक रहे थे। शोभायात्रा में पारंपरिक के साथ आधुनिक नागपुरी गीतों की धूम रही। फूल गेलक सरई फूल, सरहुल दिना आबे गुईया, जोड़ा मांदर बाजे, बांसा मुरलिया पिया परदेसिया, सिरियो रियो सलय और.. गीतों पर लोगों ने जम कर नृत्य किया।ड्ढr शोभायात्रा में ठेठ आदिवासी गीत थे, नगाड़े और मांदर की थाप थी और लयबद्ध थिरकते अदिवासियों के कदम थे। शोभायात्रा का मार्ग सरना झंडों से पटा था। मार्ग में कई तोरणद्वार बनाये गये थे। कई संस्था संगठनों ने झांकियां प्रदर्शित की। शाम में हुई हल्की बारिश ने माहौल को खुशनुमा बना दिया।ड्ढr अलबर्ट एक्का चौक पर सबसे पहले पौने चार बजे नेवरी विकास युवा समिति की शोभायात्रा पहुंची। इसके बाद नवीन सरना कॉलेज छात्रावास, हेहल सरना समिति, इटकी रोड बजरा सरना समिति, सरना छात्रावास हरमू, सरना जागृति समिति चाला नगर, पुरानी पुलिस लाइन सरना समिति, समाज कल्याण समिति, चडरी सरना समिति, आदिवासी कॉलेज छात्रावास, उलातू सरना समिति भगीरथी कॉलेज छात्रावास, हरमू सरना समिति, बोड़ेया सरना समिति की शोभायात्रा अलबर्ट एक्का चौक पहुंची। वहां चडरी सरना समिति और आदिवासी जनपरिषद की ओर से पाहनों को धोती और पगड़ी देकर सम्मानित किया गया। इनमें सूरा पाहन, महेंद पाहन, संतोष मुंडा, मंगरा पाहन, मंटू पाहन, एतवा उरांव, बैजनाथ टोप्पो, बिरसा पाहन शामिल थे। शोभायात्रा में शामिल श्रद्धालु सिरमटोली सरना स्थल पहुंचे, जहां उन्होंने सरना वृक्ष की परिक्रमा की और वहां जल और साथ लाये फूल अर्पित किया। सिरमटोली सरना स्थल में केंद्रीय सरना समिति के जादो उरांव, विजय उरांव और अन्य सदस्यों ने भी स्वागत किया।ड्ढr पाहन ने की भविष्यवाणी खूब लहलहायेगी फसलड्ढr रांची। हातमा के मुख्य पुजारी शिवलाल पाहन रविवार को सरना स्थल पहुंचे और वहां शनिवार की शाम रखे गये दोनों घड़ों का पानी देखा। इसके बाद उन्होंने भविष्यवाणी की कि इस साल उत्तर दिशा में बारिश कम होगी। दक्षिण में पर्याप्त वर्षा की संभावना है। राज्य में खेती-बारी अच्छी होगी और धन-धान्य की कमी नहीं होगी। सरना स्थल पर कई मुर्गो की बलि दी गयी। बलि से पूर्व मुर्गो ने दाना खाया, जिससे अनुमान लगाया गया कि इस साल अनाज की कमी नहीं होगी। मुर्गो की बलि के पीछे की पारंपरिक मान्यता इस प्रकार है:-ड्ढr सफेद मुर्गे की बलि : सूर्यदेव को खुश करने के लिए ताकि दिन अच्छा गुजर।ड्ढr रंगुआ मुर्गे की बलि : गांवदेवती के लिए। गांव के देवी-देवता प्रसन्न हों, तो गांव वालों को किसी प्रकार का कष्ट नहीं होता है।ड्ढr माला मुर्गे की बलि : नदी-नाला, गढ़ा-ढोढ़ा के लिए। इनसे भगवान रक्षा कर, ताकि हरक व्यक्ित सुरक्षित अपने घर पहुंच सके।ड्ढr लुपुंग मुर्गी की बलि : गांव के पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिएड्ढr काली मुर्गी की बलि : भूत-प्रेत और डाइन-बिसाही से ग्रामीणों की सुरक्षा के लिए।ड्ढr रीति-विधि से की पूजाड्ढr रविवार, चैत पक्ष द्वितीया की सुबह पाहनों ने सरना स्थल जाकर वहां शनिवार को रखे दो घड़ों में पानी का स्तर देखा। पाहनों ने हर परिवार से पूजा के लिए अपर्ण उगाही की, नौतुन मुर्गियां पकड़ीं, जिन्हें सरना स्थल में पूजा गया। मान्यता है कि सूर्य और पृथ्वी के मिलन से सृष्टि की उत्पत्ति हुई। इसलिए पाहनों ने सरना स्थल में आकाश की ओर देखते हुए अर्पण चढ़ाया और मुर्गो को चराया। पूजा के बाद सुड़ी (टहरी) भात बनायी गयी, जिसे प्रसाद के रूप में श्रद्धालुओं के बीच वितरित किया गया। सोमवार, चैत शुक्ल पक्ष चतुर्थी के दिन फूलखोंसी होगी।ं

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