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मोबाइल फूड कोर्ट

मोबाइल फूड कोर्ट

मंदी एक अजीब सा अंधड़ है। इसके गर्दोगुबार से कोई नहीं बचता। नौकरी की असुरक्षा, व्यवसाय का गिरता ग्राफ यानी हर ओर तनाव ही तनाव है। पर अपने शहर में तनाव और भूख का भी अजीब रिश्ता है। तनाव बढ़ता है तो भूख भी बढ़ती है। दफ्तर की राजनीति पर गर्मा-गर्म बहस सबसे ज्यादा कैंटीन में ही होती है.. ओवर ए कप ऑफ टी नहीं, भरपेट भोजन के साथ।

मंदी है तो किफायत जरूरी है। कैंटीन और रेस्तरां का खर्च बचाना भी जरूरी है, इसलिए आजकल दफ्तर के लिए निकलते वक्त ब्रीफकेस या पर्स के साथ खाने-पीने के सामान से लैस एक बड़ा-सा थैला नजर आने लगा है। दफ्तर में बढ़े काम के घंटों के बीच के ब्रेक में यह थैला बड़ा काम आता है। जब सब अपने-अपने थैलों में से सामान निकाल अखबार पर सजते हैं तो वहां बन जता है एक फूड कोर्ट। इस फूड कोर्ट में चपाती, दाल-चावल, तरह-तरह की सब्जियां, दही, भांति-भांति के अचार, सलाद का सामान (जिसे साथ लाई छुरी से ताज-ताज काटा जता है), शिकंजी, डेजर्ट में हलवा, खीर, आम, खरबूज, तरबूज के कटे टुकड़े-सब कुछ होता है। नमकदानी, चीनी की पुड़िया और मीठी सौंफ भी होती है। इनका होना अनिवार्य है। ये न हों तो खलबली सी मच जाती है।

नाश्ते का पॉलिथिन सबके थैलों में अलग से बंधा होता है। उसे पंचायत में खोलना जरूरी नहीं। जब चाय आए तो उसे अपनी सीट पर अकेले भी इंजॉय किया ज सकता है, क्योंकि वह कॉस्टली अफेयर है। उसके मेन्यू में बिस्कुट, मिक्सचर, चिप्स, नानखताई, केक रस्क, सैंडविचेज, पैटीज जसे स्नैक्स या लीची, फालसे, जमुन, केला जसे फल शामिल होते हैं। यह एलाकार्टे यानी फिक्स्ड मेन्यू नहीं होता। यह रोज बदलता रहता है। आइए मोबाइल फूड कोर्ट कल्चर के कुछ सदस्यों से मिलते हैं, जो इस संस्कृति के जन्म को मंदी के साथ-साथ हैल्थ कॉन्शस होने से भी जोड़ कर देखते हैं-

नेहा Þश्रीवास्तव,  काम: पीआरओ, ऑफिस पहुंचने का समय:सुबह10 बजे, निकलने का: 6 बजे..
मंदी में फिजूलखर्ची रोकना समझदारी है। इसके बहाने सेहत भी सुधर रही है। पहले अनाप-शनाप खाते थे, पर अब पौष्टिक भोजन की शरण में आ गए हैं। मैं अपनी सेहत को लेकर काफी सचेत रहने लगी हूं। मेरा काम काफी भागदौड़ भरा है। कभी यहां तो कभी वहां। पर इस सबके बीच मैं अपना खाना स्किप नहीं करती। सुबह हल्का नाश्ता करके घर से निकलती हूं, पर लंच के लिए दही, चावल, दाल, सब्जी, सलाद और दो रोटियां जरूर लेकर जती हूं। इसके अलावा बीच में खाने के लिए मेरे बैग में फ्रूट्स जरूर रखे रहते हैं। काम का इतना प्रेशर होता है कि चटर-पटर बैग में डालना ही पड़ता है, जिसमें वेफर्स, नमकीन के अलावा फ्रूटी होती है।

श्वेता आहुज, काम: प्रोडक्शन हाउस में असिस्टेंट प्रोड्यूसर, ऑफिस पहुंचने का समय: सुबह 10 बजे, लौटने का: कोई नहीं..
हम लोगों के प्रोफेशन में घर आने-जने का कोई समय नहीं होता, इसलिए जहिर है कि खाने के लिए भी समय की कोई पाबंदी नहीं होती। पहले कभी यूनिट के साथ खा लेते थे तो कभी बाहर से मंगवा लेते थे, पर अब मेरी ज्यादातर कोशिश रहती है कि मैं घर का ही खाना खाऊं, क्योंकि बाहर के खाने से सेहत और जेब दोनों ढीले हो जते हैं। लंच के लिए मैं अक्सर राइस ले जती हूं। राइस ईटर जो हूं। कभी कर्ड राइस, कभी ऐग राइस, कभी फ्राइड राइस तो कभी तहारी। चावल जल्दी कुक भी हो जते हैं और ठंडे होने पर चपाती की तरह उनकी हालत पतली भी नहीं होती। पर खाने में केवल चावल ही पर्याप्त नहीं होता, इसलिए जूस, फल, मैरी गोल्ड बिस्किट या फिर लो कैलरी नमकीन भी साथ में जरूर रखती हूं। थर्मस में नींबू पानी या फिर ग्लूकोज का पानी रखती हूं, जिससे बॉडी को एनर्जी मिलती रहे।

नवीन सूद, काम: ईवेंट मैनेजर, ऑफिस पहुंचने का समय: सुबह 10 बजे, लौटने का: कोई नहीं..
वसे तो ईवेंट्स में इतना खाना-पीना होता है कि खाने-पीने की चिंता करने की कोई जरूरत नहीं, पर जब ईवेंट्स नहीं होते तो उतनी रिच डायट खाने के लिए बहुत पैसे खर्च होते हैं। दफ्तर के बाकी लोग तो बारी-बारी से खाना ऑर्डर करते हैं, पर मैं उनमें शामिल नहीं होता। इसमें मेरी बीबी मेरी पूरी मदद करती है। ऑफिस से निकलते वक्त मेरे बैग में कंपलीट लंच होता है, जिसमें दाल, चावल, सब्जी, दही, सलाद, रोटियों के अलावा एक स्वीट डिश जरूर होती है। शाम के लिए स्नैक्स में मसाले वाला पनीर, फ्राइड काले चने और जूस साथ ले जाता हूं। 
 
हरजिंदर सिंह, काम: बीमा एजेंट, ऑफिस पहुंचने का समय: 10 बजे, रात को लौटने का: 6-7 बजे।
खाने के बारे में जरा भी लापरवाही नहीं करती। ऑफिस जते समय प्रॉपर लंच बनवा कर ले जती हूं। उसमें राजमा, छोले, दाल या फिर मिक्स वेज होते हैं। नमकीन लस्सी भी रखती हूं। फील्ड के लिए स्टफ्ड परांठे और अचार ले जती हूं। पोंगा बनाया और कहीं भी खा लिया। लू से बचने के लिए कच्ची प्याज और नींबू पानी भी रहते ही हैं।

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