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दो टूक

गुरुवार की सुबह दजर्न भर मौतों की खबर लाई। सात जिंदगियां नोएडा एक्सप्रेस-वे पर खत्म हुईं, बाकी दिल्ली के अंदरुनी इलाकों की सड़कों पर। केशवपुरम में ड्राइवर का नशा फुटपाथ पर सोने वालों का काल बन गया। हम चाहें तो फिर से सिस्टम को कोस सकते हैं। ट्रैफिक पुलिस में दोष ढूंढ़ सकते हैं।

लेकिन ऐसी लानत-मलामत हमें कहीं नहीं पहुंचाती। असली बात कुछ और है। हम लाख फ्लाईओवर और एक्सप्रेस-वे बना लें। चाहे जितनी नई ट्रैफिक तकनीक ले आएं। लेकिन जब तक आम नागरिक के भीतर सड़क पर चलने की संस्कृति नहीं विकसित होगी, ये हादसे नहीं थमेंगे। सवाल रोड का नहीं, रोड सेंस का है। दूसरों की लापरवाही और गलती का नहीं, अपनी खुद की सावधानी और तमीज का है।

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