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सिविल सेवा में भी है स्त्रियों से भेदभाव

भोपाल से 35 किलोमीटर दूर बसे मध्यप्रदेश के छोटे से कस्बे सिहोर के पास गर्व करने का एक और कारण मिल गया है। कुछ हफ्ते पहले तक यहां के स्थानीय लोग दो बातों पर गर्व करते थे:- एक तो यह कि 1824 में जिसे वे अंग्रेजों के विरुद्ध भारत का पहला स्वाधीनता संग्राम मानते हैं, कुंवर चैन सिंह नाम के जिस व्यक्ित ने लड़ते हुए अपनी जन दी, उसकी समाधि इसी कस्बे में है।

दूसरी बात यह है कि भारत के पूर्व उपराष्ट्रपति न्यायमूर्ति मोहम्मद हिदायतउल्लाह ने अपनी पढ़ाई सिहोर में ही की थी। लेकिन अब उन्हें गर्व करने की यह भी वजह मिल गई है कि छंटनी में निकाले गए एक मजदूर की बेटी का चयन भारतीय प्रशासनिक सेवा में हो गया है।

हालांकि प्रीति मैथिल का नाम देश की उन तीन महिलाओं में नहीं है, जिन्होंने सिविल सेवा परीक्षा में टॉप किया है, लेकिन 92 वां स्थान प्राप्त करना भी एक अतुलनीय उपलब्धि है। महज 23 साल की उम्र में उसने पहली बार में इस परीक्षा को पास कर लिया। उनके पिता संतोष कुमार सन् 2002 से बेरोजगार हैं। भोपाल सुगर इंडस्ट्रीज बंद होने के बाद उनकी नौकरी चली गई थी। स्थानीय लोग बताते हैं कि फैक्ट्री बंद होने की प्रमुख वजह यह थी कि सिहोर में पानी खत्म हो गया था।

इसलिए फैक्ट्री कैसे चल सकती थी। यह हमारे तमाम छोटे शहरों की कहानी है, जहां बिजली और पानी जसी बुनियादी सेवाओं के गायब हो जने के साथ रोजगार के साधन सूख गए हैं। फिर सिहोर जसे कस्बे के पास इतिहास के अलावा भी बहुत कुछ है। वे ऐसी शिक्षा प्रणाली होने का दावा करते हैं, जहां से प्रीति जसे लोग पैदा होते हैं। लेकिन त्रासदी यह है कि इन कस्बों से तमाम शिक्षा और सपने लेकर तमाम युवा निकलते हैं, पर उनकी कोई संभावना नहीं होती।

अब जरा इस साल की सिविल सर्विस परीक्षा पर गौर करें तो पाएंगे कि मीडिया ने उन टॉप करने वाली तीन महिलाओं की सफलता पर विस्तार से चर्चा की। शुभ्रा सक्सेना, शरणदीप बराड़ और किरण कौशल के इंटरव्यू तमाम अखबारों के पहले पेज पर छाए रहे। लेकिन इससे क्या वह हकीकत बदल जएगी, जिसका सामना वे प्रशासनिक सेवाओं में प्रवेश करने के बाद करती हैं?

भारतीय प्रशासनिक सेवा की सभी महिलाओं के लिए लिंगभेद की समस्या नहीं रहती। पर कई के लिए रहती है। उनमें से कुछ ने मीडिया में इस बात को खुलेआम उठाया है। महाराष्ट्र जसे राज्य में जब महिला अफसरों को लगा कि तरक्की में उनकी उपेक्षा की ज रही है तो एकजुट हुई हैं। कुछ मामलों में उनके स्टेटस का सवाल भी चर्चा में रहा है। लेकि न क्या इससे सिविल सेवा के काम करने के तरीके में कोई स्थायी बदलाव होगा, यह अभी भी एक खुला सवाल है। कुछ चीजें बदली हैं। वीणा सीकरी जो भारतीय विदेश सेवा में थीं, लिखती हैं कि जब उन्होंने 1971 में नौकरी ज्वाइन की तो विवाहित महिलाओं को आने की इजजत नहीं थी। विवाह करने के लिए उन्हें विशेष अनुमति लेनी पड़ी। उनका कहना है कि विवाह करने के बाद कई महिलाओं ने सेवाएं छोड़ दीं।

महज 30 साल पहले सीबी मुथम्मा जसी महिला अधिकारियों को सचिव के पद तक तरक्की न दिए जने के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट तक मुकदमा लड़ना पड़ा। वीणा सीकरी को भी दरकिनार कर किसी अन्य को विदेश सचिव बनाया गया और आज तक उन्हें इसका कारण नहीं बताया गया। आजकल वे नई  दिल्ली के जमिया मिलिया विश्वविद्यालय में पढ़ा रही हैं। तीन महिलाओं के सिविल सेवा टॉप करने से इस सेवा में कार्यरत महिलाओं के विचार भी सार्वजनिक हुए हैं।

उनमें से कई बताती हैं कि अभी भी उनके लिए सफल होना मुश्किल है। मामला यह नहीं है कि उन पर पत्नी, मां और प्रोफेशनल होने का दोहरा भार होता है। उनके साथ एक तरह का पक्षपात हमेशा किया जता है, जिसका उनकी योग्यता से कोई लेना-देना नहीं है, बल्कि उसकी वजह उनका महिला होना ही है।

एशियन एज (10 मई 2009 के अंक) में उत्तर प्रदेश की एक महिला अधिकारी को यह कहते उद्धृत किया गया है कि  ‘‘कॉडर सर्विसेज में महिलाओं की मौजूदगी दर्ज होने की सारी बातें गप हैं। उत्तर प्रदेश जसे राज्य में महिला अफसरों के साथ उनके पुरुष सहयोगी अभी भी भेदभाव करते हैं। अगर कोई महिला अधिकारी अपने पुरुष राजनीतिक बॉस से संवाद स्थापित करती है तो उसे उसके साथ रोमांस करने वाली बताया जता है। लेकिन जब पुरुष अधिकारी अपने महिला बॉस से संवाद बनाते हैं तो ऐसा कोई आरोप नहीं लगता। एक महिला अधिकारी दो गुना काम कर के भी अपने पुरुष सहयोगी के मुकाबले आधी योग्य ही मानी जती है।’’

इस महिला अधिकारी के विचार सार्वदेशिक नहीं हो सकते। बहुत सी महिला अधिकारी हो सकती हैं, जो किसी तरह के भेदभाव से इनकार करती हैं। फिर भी इस तरह की शिकायतों के कुछ स्वर यह बताते हैं कि सेवा में जने के बाद पुरुषों और महिलाओं के लिए खेल के नियम एक जसे नहीं रहते। हालांकि वे खुली प्रतियोगिता के माध्यम से सेवा में चुनी जती हैं, जहां उन्हें महिला होने के नाते किसी तरह की रियायत नहीं मिलती। महिला अधिकारियों को समस्याओं का सामना करना पड़ता है फिर भी इस बात में कोई संदेह नहीं है कि सिविल सेवा फिर भी वास्तविक ‘सेवा’ का विशिष्ट अवसर प्रदान करती है।  एक ईमानदार और सरोकार वाला अधिकारी अगर जिलों में तैनात किया जए तो लोगों के जीवन में जबरदस्त बदलाव ला सकता है। जब भी आप जिलों की यात्रा करते हैं तो आप इस तरह के अधिकारियों की कहानियां लगातार सुनते हैं। वे दूसरी जगहों पर स्थानांतरित हो जते हैं, तब भी जनता उन्हें याद करती है।

उदाहरण के लिए बिहार के नवादा जिले में लोग अभी भी एन विजय लक्ष्मी की चर्चा करती हैं जो इन दिनों पटना में आवकारी आयुक्त हैं। नवादा में अपने कार्यकाल के दौरान उन्हें स्थानीय मुद्दों में रुचि लेने के लिए याद किया जता है। लोहारपुरा पंचायत की मुखिया वीणा देवी उन्हें बहुत याद करती हैं। वीणा जब पहली बार मुखिया बनीं तो व्यवस्था उन पर हावी रहती थीं और वे संकोच करती थीं। उस समय विजय लक्ष्मी पुरुष प्रधान पंचायत की बैठकों में उन्हें बोलने के लिए प्रेरित करती थीं।

उसका नतीज यह है कि यह अर्धसाक्षर महिला आज इलाके की अच्छी नेता है और उसे भविष्य की राजनीतिक संभावना के तौर पर देखा जता है। एक दिन ऐसा आएगा जब सिविल सेवा परीक्षा में महिलाओं के टॉप करने को मीडिया इतना महत्वपूर्ण नहीं मानेगा। लेकिन तब तक जब भी कोई महिला टॉप करेगी तो हमें उस कठिन राह की याद आएगी, जिससे बहुसंख्यक महिलाएं गुजरती हैं विशेष कर तब जबकि वे प्रीति मैथिल जसी गरीब होती हैं।

kalpu.sharma@ gmail. com

लेखिका स्वतंत्र पत्रकार हैं।

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