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गठबंधन धर्म : आखिर में चली द्रमुक की दादागिरी

हालांकि 15 वीं लोकसभा के लिए हाल में हुए आम चुनाव में कांग्रेस के पक्ष में बहुचर्चित जनादेश मिला पर कांग्रेस को सरकार बनाने में तमाम तरह की समस्याएं आईं। जसा कि सर्वविदित है कि समस्या कांग्रेस पार्टी के चुनाव पूर्व से गठबंधन से पैदा हुई। यूपीए के इन सहयोगी दलों ने न सिर्फ मंत्रालयों की संख्या के लिए, बल्कि विभागों के लिए भी सौदेबाजी की ।

इन प्रतिस्पर्धी दावों को निपटाने के लिए चलने वाली वार्ताओं ने देश के उस उत्साह पर पानी फेर दिया, जो नई सरकार आने के साथ उसके भीतर बना था। देश को उम्मीद थी कि चुनाव प्रक्रिया शुरू होने के नाते तीन महीने से रुकी हुई प्रशासन की प्रक्रिया जल्दी शुरू होगी। इसने अपना मंत्रिमंडल चुनने में प्रधानमंत्री की ‘स्वतंत्रता’ के बारे में भी दुराग्रही सवाल उठाए।

यह पूरा टकराव तमिलनाडु की सत्तारूढ़ पार्टी द्रविड़ मुनेत्र कषगम और उसकी इस मांग के इर्द-गिर्द घूमता रहा कि उसको उतने ही मंत्रालय चाहिए जितने चौदहवीं लोकसभा में थे। द्रमुक के अध्यक्ष और तमिलनाडु के मुख्यमंत्री अपनी मांगें रखने के पहले यह समझने में नाकाम रहे कि मौजूदा लोकसभा का गणित पिछली लोकसभा के मुकाबले एकदम अलग है।

यूपीए के भीतर भी द्रमुक का स्थान दूसरे नंबर की सबसे बड़ी पार्टी से खिसक कर तीसरे नंबर पर आ गया। तृणमूल कांग्रेस उससे आगे निकल गई। वास्तव में तृणमूल कांग्रेस की नेता ममता बनर्जी ने द्रमुक के मुकाबले एक अतिरिक्त मंत्रालय की मांग की थी। बहुत संभव है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और यूपीए की चेयरमैन सोनिया गांधी ने ममता बनर्जी की इस मांग का इस्तेमाल द्रमुक की नौ मंत्रालयों की मांग को कमजोर करने के लिए किया। द्रमुक चाहती थी कि उसके प्रति दो सांसदों पर एक मंत्रालय दिया जए, जबकि कांग्रेस ने नौ सांसदों पर एक मंत्रालय देने का फामरूला तैयार किया था। आखिर में इन्हीं दोनों के बीच कोई समझोता हुआ।

प्रधानमंत्री के विशेषाधिकार वाले क्षेत्र में द्रमुक ने एक और हस्तक्षेप किया, जिसकी वजह से देश दो हफ्ते तक मंत्रालयों के बंटवारे के सवाल पर अटका रहा। द्रमुक के पितृपुरुष ने न सिर्फ कांग्रेस के पास मंत्रियों के नाम भेजे, बल्कि यह भी भेज कि दिल्ली में किसे कौन सा जिम्मा दिया जए। लेकिन कांग्रेस इस तरह के ब्लैकमेल के आगे झुकना नहीं चाहती थी और वह इस बात पर अड़ी रही कि द्रमुक के लिए वह अलग पैमाना नहीं बनाएगी। करुणानिधि को सही बात समझने के लिए कांग्रेस के नेताओं को उनसे कई दौर की बातचीत करनी पड़ी।

इन चर्चाओं के बाद जो अंतिम फामरूला तय हुआ वह था -करुणानिधि के बड़े बेटे अझगिरि, उनके भतीजे दयानिधि मारन और पार्टी के नेता ए. राज के लिए कैबिनेट मंत्री का पद और चार अन्य के लिए राज्य मंत्री की पद। लेकिन इनमें से कोई स्वतंत्र प्रभार नहीं रहेगा। इस दौरान टी.आर. बालू को मनमोहन कैबिनेट से बाहर रखने का फैसला किया गया। 1996 के बाद यह पहला मौका है कि बालू केंद्र में मंत्री नहीं रहेंगे। बालू मनमोहन सरकार में (2004-09) के बीच जहाजरानी, सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री थे।

उसके पहले वे भाजपा के अटल बिहारी वाजपेयी के मंत्रिमंडल में पर्यावरण और वन मंत्री थे। हालांकि इस बात पर काफी राहत व्यक्त की ज सकती है कि कांग्रेस और द्रमुक का विवाद तमिलनाडु और दिल्ली में  शांति से निपट गया लेकिन कुछ सवाल अभी भी हैं, जिन पर अकादमिक और राजनीतिक दायरे में बातचीत हो सकती है। पहला और सबसे प्रमुख सवाल अझगिरि को  केंद्रीय मंत्रिमंडल में लिए जने के बारे में है।

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री का यह पुत्र पहली बार चुनाव लड़ कर जीता है। इससे पहले वे तमिलनाडु के दक्षिणी जिलों में पार्टी का काम देखते थे और उनके पास प्रशासन का कोई अनुभव नहीं है। न ही उन्हें इस बात का अनुभव है कि राष्ट्रीय स्तर पर कौन सी राजनीति किस प्रकार चलती है।

रपटों के अनुसार करुणानिधि अझगिरि को मंत्री बनाने दबाव पार्टी हितों के चलते नहीं पारिवारिक मजबूरियों के नाते बना रहे थे। लेकिन इस अन्याय पर पार्टी के भीतर से चूं की आवाज भी नहीं आई। इससे पता चलता है कि द्रमुक के भीतर आंतरिक लोकतंत्र की वास्तविक स्थिति क्या है। हालांकि वह देश की सबसे पुरानी द्रविड़ पार्टी है।

दूसरी तरफ कांग्रेस ने क्षेत्रीय दलों के दबाव को स्वीकार करते हुए जिस प्रकार अच्छे प्रशासन की जरूरत के सामने राजनीतिक मजबूरियों को तरजीह दी, उससे उसकी भी गरिमा नहीं बढ़ी है। यूपीए के प्रमुख घटक ने सहयोगी दलों की अनुचित मांगों की दादागीरी के आगे समर्पण कर दिया। उधर ममता बनर्जी ने एक और मंत्रालय की मांग रख कर पश्चिम बंगाल में अपने राजनीतिक लक्ष्य के लिए कांग्रेस पर दबाव बनाया है। इन स्थितियों को देख कर तो यही लगता है कि भारतीय लोकतंत्र गठबंधन सरकारों के साथ तो जीना सीख गया है, पर उसने गठबंधन धर्म नहीं अपनाया।

लेखिका वरिष्ठ पत्रकार हैं।

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