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विस्तार और भागीदारी

भारत जैसे क्षेत्रीय, धार्मिक, जातीय और भाषाई विविधता वाले विशाल देश में यह संभव ही नहीं है कि ऐसा मंत्रिमंडल बनाया जाए जिससे देश का हर हिस्सा और समाज का हर तबका संतुष्ट हो। फिर भी कार्यकु शलता और भागीदारी के लिहाज से एक संतुलन कायम करना प्रधानमंत्री का दायित्व भी है और विशेषाधिकार भी। लेकिन लगता है कि काफी जद्दोजहद के बावजूद प्रधानमंत्री न  छोटा मंत्रिमंडल बना पाए और न ही क्षेत्रीय और जतीय संतुलन बिठा पाए।

कांग्रेस की संसदीय ताकत बढ़ने और क्षेत्रीय दलों पर निर्भरता घटने के साथ यह उम्मीद थी कि इस बार गठबंधन धर्म का वसा दबाव नहीं रहेगा जसा पिछली बार था। यह दबाव इतना ही कम दिखा कि जहां पिछली बार यूपीए के साथी दलों के 23 मंत्री थे, वहीं इस बार वे 19 ही हैं। पर इससे मंत्रिमंडल का आकार पिछली बार से कहीं कम नहीं हुआ और जिन युवा प्रतिभाओं को युवा वर्ग की उम्मीद बताया ज रहा है, वे सब पारिवारिक दायरे से बाहर नहीं हैं।

इस मंत्रिमंडल के जिस असंतुलन पर सबसे ज्यादा ध्यान दिया ज रहा है, वह है    हिंदी भाषी राज्यों और विशेष कर यूपी की उपेक्षा। देश को आठ प्रधानमंत्री देने  वाला प्रदेश पिछले दो दशक में कांग्रेस नीत सरकारों के दायरे से लगभग बाहर ही रहा है। लेकिन इस बार उसने कांग्रेस के प्रति जो ललक दिखाई उसका प्रतिउपकार उसे मिलता नहीं दिखा।

यूपी और बिहार में कांग्रेस को पुनर्जीवित करने की चुनौती के सामने यह भागीदारी कम ही लगती है। उन्हें मंडलवादी जतियों को दरकिनार करने के बजय उनको अपने भीतर समाहित करने का प्रयास भी करना चाहिए था।  मुस्लिमों के मुकाबले दलितों को दो गुनी भागीदारी देने के पीछे कांग्रेस की दलित जनाधार को वापस लाने की रणनीति और साथ में यह सोच भी  दिखती है कि मुस्लिम और कहां जएंगे।

मंत्रिमंडल की संरचना के विभिन्न अर्थो के बीच यह देखना भी जरूरी है कि उसका आकार इतना बड़ा न हो कि वह विधायिका पर भारी दिखने लगे। उसके संतुलन के लिए मोइली समिति केंद्र सरकार को 25 मंत्रियों से काम चलाने का सुझव दे चुकी है। विडंबना देखिए कि अमेरिकी राष्ट्रपति 15 मंत्रियों से काम चलाता है तो हमारे प्रधानमंत्री को 33 मंत्रियों की आवश्यकता पड़ती है। उम्मीद की जनी चाहिए कि भारतीय लोकतंत्र इस विडंबना से भी बाहर निकलेगा।

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