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दक्षिण एशिया पर केंद्रित हो विदेश नीति

नई सरकार बनने के साथ-साथ यह स्पष्ट हो चुका है कि उसे क्षेत्रीय सुरक्षा का इंतजम संभालने में जरा भी देर नहीं करनी चाहिए। पिछले कई सालों से दक्षिण एशिया हर तरह के जतीय और धार्मिक झगड़ों से घिरा रहा है, लेकिन भारत आज पहले से कहीं ज्यादा क्षेत्रीय सुरक्षा की समस्याओं से ग्रसित है। भूटान को छोड़कर भारत की सीमा से लगे सभी राज्य विभिन्न किस्म और आकार के संकट में उलङो हुए हैं।

अंतरराष्ट्रीय Þोणियों के बीच भारत की उभरती शक्ित के रूप में होने वाली सारी चर्चाओं के बावजूद उसे अपने ही आस-पास का नेतृत्व कर पाने में कठिनाई हो रही है। जिस तरह से दक्षिण एशिया में चीन का महत्व बढ़ रहा है, उससे भारत क्षेत्रीय रणनीतिक जमीन पर दरकिनार हो गया है और इससे भारत के नीति निर्माताओं के कान खड़े हो गए हैं।

इस स्थिति का इससे ज्यादा प्रमाण क्या हो सकता है कि Þाीलंका की तेजी से उभरती स्थिति के बीच भारत अपनी बात मनवाने की बेचैन कोशिश कर रहा है। लिट्टे प्रमुख वेल्लुपिल्लई प्रभाकरण के मारे जने के बाद Þाीलंका ने लिट्टे पर पूर्ण विजय की घोषणा कर दी है, ऐसी स्थिति में भारत को ¨हद महासागर के इस द्वीप वाले देश के लिए अपनी रणनीति तेजी से दुरुस्त करनी होगी।

Þाीलंका सरकार ने वादा किया है कि वह लिट्टे के नियंत्रण में रहे देश के उत्तरी हिस्से में विकास के मुख्य काम करेगी और तमिलों के अधिकारों की रक्षा करेगी । फिर भी प्रभाकरण की हत्या के बाद, जिस प्रकार तमिलनाडु राज्य में आक्रोश व्यक्त हुआ उससे लगता है कि भारत को जतीय विवाद के बाद के माहौल में सावधानी पूर्वक संतुलन का काम करना होगा। लिट्टे के छापामारों की घुसपैठ के बीच भारत के तटवर्ती इलाकों में चौकसी बढ़ा दी गई है। विस्थापितों के सवाल पर तमिल प्रवासियों में नाराजगी और इधर भारतीय राजनेताओं के खिलाफ असंतोष बढ़ रहा है।

जहां भारत घरेलू राजनीतिक कारणों के चलते Þाीलंका को रक्षा संबंधी मदद देने में अक्षम था, वहीं खाली जगह को भरने के लिए चीन तेजी से आगे आया और वह Þाीलंका को सबसे ज्यादा हथियार सप्लाई करने वाला देश बन गया। Þाीलंका से इन संबंधों के चलते उसे हिंद  महासागर के अहम गलियारे में पैर जमाने की जगह मिल गई और वह उस जगह में घुस गया, जिसे भारत अपना प्रभाव क्षेत्र मानता था।

चीन Þाीलंका को सिर्फ सैनिक साजो सामान ही नहीं सप्लाई करता, बल्कि प्रशिक्षण भी देता है और Þाीलंका को गैस निकालने और हमबनटोटा में एक आधुनिक बंदरगाह कायम करने में मदद भी करता है। चीन जो हथियार सप्लाई करता है उसमें लड़ाकू विमान, बख्तरबंद सैन्य वाहन, एंटी एअरक्राफ्ट गन, हवाई निगरानी राडार, रॉकेट से प्रक्षेपित ग्रेनेड लांचर और मिसाइलें शामिल हैं। इस प्रकार   उसने उस पहले आतंकवादी संगठन के सामने, Þाीलंका की सेना की स्थिति मजबूत कर दी, जो थलसेना, नौसेना, वायुसेना और छोटी पनडुब्बी  शक्ित होने का भी दावा करता था।

भारत अब पुनर्निर्माण सहायता के माध्यम से Þाीलंका में राजनयिक अभियान की योजना बना रहा है, ताकि वह चीन के प्रभाव को निष्फल कर सके। लिट्टे के खत्म होने के बाद भारत को अब Þाीलंका से अपने संबंधों को सुधारने का बेहतर राजनयिक मौका मिल रहा है। भारत को अब इस बात पर जोर देना चाहिए कि Þाीलंका सरकार विस्थापित तमिलों को राहत और पुनर्वास देने के लिए कुछ तेज कदम उठाए और तमिलों को मुख्यधारा में शामिल करने के लिए योजना शुरू करे।

हालांकि भारत सरकार यह भी चाहेगी कि राजपक्षे सरकार तमिलों को अधिकार सौंपने का एक पैकेज तैयार करे । पर इसलिए संभव नहीं है क्योंकि मौजूदा सरकार के नियंत्रण में संसद नहीं है। Þाीलंका में भारत का हस्तक्षेप भी सफाई से होना चाहिए और प्रभावी भी। ताकि एक तरफ भारत की घरेलू संवेदनाओं का ख्याल रखा ज सके और दूसरी तरफ उसके रणनीतिक हितों पर भी  विपरीत असर न पड़े।

जहां तक नेपाल का मामला है तो वहां की माओवादी सरकार के इस्तीफे के बाद गंभीर संकट पैदा हो गया है और भारत को इसके लिए जिम्मेदार ठहराया ज रहा है।  ऐसे में भारत को ऐसा रुख अपनाना होगा, जिससे नेपाल की हस्तक्षेप संबंधी आशंका खत्म हो। दूसरी तरफ भारत को परदे के पीछे से ऐसी स्थितियां बनानी होंगी कि वहां एक स्थिर सरकार बने, जो न सिर्फ माओवादियों के दुष्प्रचार का जवाब दे, बल्कि चीन के बढ़ते असर को कम करे।

उधर पाकिस्तान में बढ़ते इस्लामी अतिवाद और नाभिकीय हथियारों के कारण वह दुनिया का सबसे खतरनाक राष्ट्र हो गया है, पर उससे जितना भारत प्रभावित होता है उतना कोई और देश नहीं। पिछले आठ सालों में आतंकवाद से लड़ने के लिए पाकिस्तान को दस अरब डॉलर की अमेरिकी सहायता मिली है, लेकिन वह उस दिशा में संस्थागत क्षमता विकसित करने के बजय भारत के साथ पारंपरिक लड़ाई लड़ने के लिए अपनी सैन्य क्षमताओं को विकसित करने में लगा है।

हालांकि अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा यह आरोप लगाते हैं कि पाकिस्तान ने अमेरिकी मदद का ज्यादातर हिस्सा भारत के खिलाफ सैन्य तैयारी में इस्तेमाल किया है, इसके बावजूद उन्होंने गैर-सैन्य सहायता को तीन गुना कर 1.5 अरब डॉलर सालाना कर दिया है और साथ में पहले से चली आ रही सैन्य सहायता जरी रखी है। बराक ओबामा यह विश्वास जरूर जताते रहते हैं कि पाकिस्तानी नाभिकीय हथियार आतंकवादी हाथों में नहीं पड़ेगा, पर इस बात की आशंका बढ़ रही है कि अमेरिकी सहायता परोक्ष रूप से पाकिस्तान के एटमी कार्यक्रम को मदद पहुंचा रही है।

रपटें बताती हैं कि पाकिस्तान का एटमी कार्यक्रम दुनिया के किसी देश के मुकाबले सबसे तेजी से बढ़ रहा है। इन स्थितियों के बावजूद मुंबई पर आतंकी हमले के बाद भारत, पाकिस्तान के लिए कोई असरदार नीति नहीं बना सका है। नई सरकार के लिए यह सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।

एक अन्य पड़ोसी बांग्लादेश की राजनीतिक संस्थाएं काफी कमजोर हैं और सेना की भूमिका अभी भी साफ तौर पर परिभाषित नहीं है। सेना ने अस्थायी तौर पर राजनीति करना छोड़ दिया है, लेकिन हाल में जिस तरह बीडीआर के विद्रोह ने विकराल रूप धारण किया था, उससे सेना के फिर सक्रिय होने की संभावना बनी रहती है। सेना का राजनीतिकरण वहां के लोकतंत्र के लिए बड़ा खतरा है। ऐसे में भारत के लिए वहां   के लोकतांत्रिक सरकार को मजबूत करते रहना जरूरी है।

दक्षिण एशिया में भारत के आकार का जो दबदबा है उसके चलते यह स्वाभाविक तौर पर छोटे पड़ोसियों के असंतोष के निशाने पर बना रहता है। इनमें से ज्यादातर देशों ने भारत की ताकत को संतुलित करने के लिए चीन से निकटता बनाई है। ऐसे में भारत के सामने पहली चुनौती पड़ोसियों से सार्थक संबंध बना कर रखने की है और दूसरी चुनौती दक्षिण एशिया में चीन के बढ़ते असर को रोकने की है। इन चुनौतियों का नई सरकार कैसे मुकाबला करेगी यहीं उसके असर का पहला इम्तहान होगा।

लेखक किंग्स कॉलेज लंदन में प्राध्यापक हैं।

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