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धर्मगुरु : हकीकत और फलसफे की खाई

कई साल पहले पंजाब के सरहदी इलाकों में रिपोर्टिग करते वक्त मेरी मुलाकात कुछ इसाइयों से हुई। उस वक्त अमृतसर के आस-पास के सरहदी इलाकों में मैंने तेजी से बन रही कई छोटी-छोटी चचोर्ं पर रिपोर्ट की थी। कई दलितों सिखों का रुझन इसाई धर्म की ओर था और ये प्रक्रिया पंजाब में आज भी कई जगह जारी है। एसजीपीसी के कुछ सदस्यों और दूसरे मकामी लोगों ने मुङो ये बताया कि गरीबी और ऊंची जाति के सिखों के बहिष्कार की वजह से दलित सिख चर्च में जा रहे हैं।

पंजाब में एक बार फिर भड़की ताजा हिंसा में जतीय भेदभाव का अक्स मिलता है। ये बुराई धीरे धीरे पनपी और फिर उसने सिक्खी जसे आदर्श धर्म  को भी जकड़ लिया। आज पंजाब में सैकड़ों डेरे हैं जो न केवल दलित सिखों को अपनी ताकत का नया एहसास करा रहे हैं, बल्कि चुनाव के वक्त नेताओं के लिए लिए एक थोक वोट बैंक भी बन चले हैं। कई ऐसे डेरों के धर्म गुरु उसी तरह अपने अनुयायियों के वोट दिला सकते हैं जैसे कभी शाही इमाम का फरमान मुस्लिम वोट किसी एक उम्मीदवार देने की कुव्वत रखता था।

करीब 500 साल पहले गुरु नानक ने संगत और पंगत का जो फलसफा दिया उसमें जातिवाद को मिटाने और भेदभाव को खत्म करने पर सर्वाधिक जोर था। दसवें गुरु गोविंद सिंह के गुरु ग्रंथ साहिब की स्थापना के पीछे एक सोच साफ दिखाई देती है कि उसी वक्त उन्होंने धर्म गुरुओं तथा राजनीति के गठजोड़ की संभावना को भांप लिया था। पिछले कई सालों से डेरों का बढ़ रहा दबदबा दलितों के सशक्तीकरण और राजनीति के घालमेल ही दु:खद कहानी है। अब दलित गुरुद्वारे में जाने के लिए किसी कुलीन जट सिख की इजाजत के मोहताज नहीं रहे।

पंजाब के गांव-गांव में दो गुरुद्वारे साथ साथ दिखाई देते हैं। इसके बाद भी कुछ दलित सिख या तो चर्च में जा रहे हैं अपने वाहे गुरु का स्थान अलग स्थापित कर रहे हैं।  अफसोस ये कि इस पूरी कोशिश में कुछ धर्मगुरुओं की जगह और हैसियत ही मजबूत हो रही है, सामाजिक समरसता नहीं। मंदिरों की तरह गुरुद्वारों में पुजारियों और ठेकेदारों के बढ़ते दबाव की वजह से ही 1920 में एसजीपीसी की स्थापना की गई। ये संस्था गुरद्वारों को धार्मिक ठेकेदारों की जकड़ से छुड़ाने के लिए बनी।

सिखों की दरियादिली और धर्म के प्रति आस्था की वजह से एसजीपीसी आज दुनिया के सबसे धनी संगठनों में से है और इसकी सियासी ताकत के बारे में भी सब जानते हैं। पर मनुष्य स्मभाव की कमजोरियां हर समाज में रहती हैं। गुरुद्वारों में बढ़ते चंदे और चढ़ावे की वजह से इक्ट्टा होने वाले खजाने पर नियंत्रण की लड़ाई भी संघर्ष में शामिल हो गई है। विएना समेत दुनिया के तमाम हिस्सों में जाकर बसे सिखों ने कई गुरुद्वारे स्थापित किए हैं जिनके पास फंड की कोई कमी नहीं। तकनीकी रूप से इन सारे गुरुद्वारों के ऊपर एसजीपीसी का कंट्रोल है लेकिन प्रबंधन के नाम पर स्थानीय लोग अब इन पर अपना वर्चस्व चाहते हैं।

कोई दो साल पहले डेरा सच्चा सौदा से जुड़े विवादों की वजह से पंजाब कई दिनों तक नफरत की आग में झुलसता रहा। पर डेरे के बढ़ती सियासी प्रभाव की वजह से अकाली और कांग्रेस दोनों ही पार्टियों के बड़े नेता सिर झुकाते रहे। जिस डेरा सच खंड को लेकर अभी विवाद खड़ा हो रहा है वो संत रविदास के अनुयायियों ने बसाया है। निचली जाति के संत रविदास चमड़े का काम करते थे और उनके अनुयायियों की पंजाब के जालंधर में बड़ी आबादी है।

अपने पूजास्थलों को इन लोगों ने जरूर गुरुद्वारों की शक्ल में स्थापित किया है। लेकिन इस संघर्ष को सिक्खी के भीतर की लड़ाई कहना शायद ठीक नहीं होगा। सिख मजहबी तौर पर एक बेहद ईमानदार तथा जज्बाती कौम है। आतंकवाद के बुरे दौर से उबरने के बाद पंजाब इस वक्त आर्थिक और सामाजिक बदलावों से भी गुजर रहा है।

पंजाब के लोग बाहर बसे हैं और उन्होंने पैसा भी कमाया है लेकिन पंजब में एक बड़ा बेराजगार तबका भी तैयार हुआ और ताजा संघर्ष की तस्वीरों में दिखने वाले कई नौजवान उसी बेकारी के मारों के विशाल समुदाय का हिस्सा हैं। एक बड़ा युवा वर्ग और तिजारत करने वाला समुदाय ऐसे टकरावों को नापसंद करता है लेकिन दूसरी ओर यह एक समुदाय की तीखी प्रतिक्रिया है जिसे काबू में रखने के लिए बल प्रयोग नहीं, सियासी समझ दिखाना अधिक जरूरी है।

लेखक एनडीटीवी से जुड़े हैं

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