अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

नाम, रूप और कर्म

संसार यानी जो ससरता रहता है। यहां सब चलायमान है। दो क्षण पूर्व जो नदी थी, (पानी) अब नहीं है। दृश्य जगत की सारी चीजें ससरती रहती हैं। पेड़-पौधे उपजते हैं, बढ़ते हैं, बचपन, जवानी और वृद्धावस्था को प्राप्त कर समाप्त हो जाते हैं। हर वस्तु का एक नाम है। उसका एक रूप है और एक निश्चित कर्म है। इन तीनों के द्वारा वे पहचाने जाते हैं। अपने जातिगत विशेषताओं से इतर भी नाम, रूप, और कर्म होते हैं। रूप समाप्त होता है पर नाम और कर्म नहीं। मनुष्य के जीवन में भी नाम, रूप और कर्म है। परंतु मरने के बाद उसका नाम और रूप भी वंश में समाहित रहता है। कर्म तो जीवित रहता ही है।

मनुष्य के अच्छे कर्मों के पीछे अपना वर्तमान और भविष्य सुधारना तो रहता ही है,  मरणोपरांत भी उन्हें लोग स्मरण करें, यह आकांक्षा भी रहती है। कुकर्म को समाज याद नहीं रखता। सुकर्म ही स्मरण किए जाते हैं।  किसी व्यक्ित के मरणोपरांत शवयात्रा में जा रहे लोग या मृत्यु की खबर सुनने वाले लोग उसके किसी न किसी गुण को स्मरण करते हैं। आपस में बांटते हैं। कई बार तो- ‘‘कितने भले आदमी थे’’ इतना भर कहा जाता है।

किसी के नाम और रूप के जीवित रहते लोग भले ही उसके गुणों का बखान न करे, मरणोपरांत तो शव के सामने उसके गुणों का ही बखान करते हैं। कुछ लोग के कर्म इतिहास के पन्नों पर अंकित हो जाते हैं। तो अधिकांश लोग अपने परिवार या गांव तक स्मरण किए जाते रहते हैं। व्यक्ित के कर्म की खाशियत पर निर्भर करता है कि वे कितनी पीढ़ियों तक स्मरण किए जाते हैं।

सामान्यतया मृतात्मा के कुकर्मों को समाज स्मरण नहीं करता। संभवत: इसलिए भी कि किसी के कुकर्म को व्यवहार में ढालना तो दूर स्मृति पटल पर भी नहीं आने देना चाहिए। अपना नाम और रूप संभालते हुए कर्म करते समय हम भूल जाते हैं कि कुकर्म जिसके संपादन में अधिक शक्ित और साधन लगता है, स्मरण के योग्य भी नहीं रह जाता।

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:नाम, रूप और कर्म