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लाहौर की लपटें

स्वात घाटी में तालिबान के खिलाफ पाकिस्तानी सेना की मुहिम कितनी कामयाब रहती है, यह कहना मुश्किल है लेकिन यह सच है कि पाकिस्तान के दूसरे इलाकों में तालिबान की मारक क्षमता के उदाहरण देखने को मिल रहे हैं। लाहौर में श्रीलंकाई क्रिकेट टीम पर आतंकवादी हमला हुए ज्यादा वक्त नहीं बीता है और अब उसी शहर में पुलिस मुख्यालय के सामने आतंकवादियों ने जोरदार बम धमाका किया। यह देखने में आ रहा है कि पाकिस्तानी सुरक्षा बल और दूसरी सरकारी वयवस्थाओं की स्थिति इतनी जजर्र है कि आतंकवादियों को ज्यादा प्रतिरोध का सामना नहीं करना पड़ता।

एक तरफ तालिबान और दूसरी तरफ अमेरिकियों को खुश रखने की चतुराई पर पाकिस्तानी सत्ता प्रतिष्ठान खुश हो सकता है, लेकिन यह भी साफ है कि वह देश की सीमाओं पर भारत विरोधी रणनीति में इतना उलझ रहा कि तमाम नागरिक संस्थानों का धीरे धीरे खात्मा होता चला गया। आतंकवादी हमलों से ज्यादा विचारणीय इस वक्त पाकिस्तानी तंत्र में व्याप्त अक्षमता और अराजकता है।

दुनिया अब भी इस बात पर पूरी तरह विश्वास नहीं कर पा रही है कि क्या सचमुच पाकिस्तानी सेना स्वात में तालिबानियों पर आक्रमण कर रही है और विजय के उसके दावे कितने सच हैं लेकिन इस जंग का खामियाज पाकिस्तान के आम शहरी जरूर भुगत रहे हैं। अगर आतंकवादी एक ही शहर में Þाीलंकाई टीम के सुरक्षा इंतजमों की धज्जियां उड़ा सकते हैं और कुछ ही महीनों के अंतर से पुलिस मुख्यालय को और आईएसआई के दफ्तर को नुकसान पहुंचा सकते हैं तो ऐसे में आम जनता कितना सुरक्षित महसूस कर पाएगी।

समस्या यह है कि तालिबान के खिलाफ अपने अभियान को अमेरिकी छोड़ नहीं सकते और जब तक वे अफगानिस्तान-पाकिस्तान में सक्रिय रहेंगे, तब तक तालिबान और दूसरे कट्टरपंथी तत्व पाकिस्तान की आंतरिक व्यवस्थाओं को तार-तार करते रहेंगे। इस हमले और इसके पहले के कई हमलों से यह भी संदेह गहरा होता है कि पाकिस्तानी सुरक्षा बलों में भी आतंकवादियों की घुसपैठ है।

इस वक्त सबसे ज्यादा जरूरी यह है कि किसी जमाने में काफी कुशल और पेशेवर रही कार्यपालिका की संस्थाओं को मजबूत किया जए, क्योंकि सिर्फ पाकिस्तानी सेना के भरोसे न पाकिस्तान कहीं पहुंच सकता है न ही अमेरिका। पाकिस्तानी तंत्र तेजी से बिखराव की ओर बढ़ रहा है और परमाणु हथियार दूसरों पर धौंस जमाने के काम भले ही आ जएं, इस बिखराव को नहीं रोक सकते।

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