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स्पोर्ट्स पावर वुमन

स्पोर्ट्स पावर वुमन

कोनेरू हम्पी

चेस..चेस और केवल चेस। कोनेरू हम्पी के बारे में कुछ ऐसा ही कहा ज सकता है। उनकी जिंदगी, जिंदगी के मायने, सब कुछ चेस के ही इर्द-गिर्द घूमते हैं। इसके अलावा न तो उनकी जिंदगी में फिलहाल कुछ है और न ही वह लाना चाहती हैं। एक 19 साल की लड़की के जीवन में बहुत कुछ होता है। बिल्कुल होता है। लेकिन कोनेरू अपवाद हैं। साधक की तरह लगी हुई हैं वो इस खेल में छह साल की उम्र से। हालांकि इससे उन्हें बहुत कुछ मिला भी। शोहरत, सम्मान, मान्यता और कुछ हद तक पैसा भी। वो विश्व की नंबर दो वुमन चेस प्लेयर हैं। व्यावहारिक तौर पर कहें तो नंबर वन, क्योंकि हंगरी की जूडिथ पोल्गर अब न के बराबर खेलती हैं।

विश्वनाथन आनंद के बाद उन्हें इस देश का बेहतरीन चेस प्लेयर माना जता है। यानी इस देश के पुरुष खिलाड़ी भी उनके आसपास नहीं हैं। इसी के चलते उन्हें चेस ओलंपियाड में पुरुष टीम में जगह दी गई।

कोनेरू की ईएलओ रेटिंग 2600 से अधिक है, वो बस 2700 से ज्यादा ईएलओ रेटिंग वाली पोल्गर से ही पीछे हैं। पूर्व अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी और अब शतरंज कोच रघुनंदन गोखले कहते हैं कि कोनेरू दिन-ब-दिन आगे बढ़ रही हैं। खास बात यह है कि वो पूरी तरह फोकस्ड हैं।
कोनेरू का करियर प्रतिकूल हालत में आगे बढ़ा। सोचिये भला जब उनकी उम्र के दूसरे बच्चे मस्ती कर रहे होते तो वह घंटों शतरंज के अभ्यास में डूबी होतीं। पिता ने उन्हें आगे बढ़ाने के लिए बैंक की नौकरी छोड़ दी। घर की आर्थिक स्थिति पर भी असर पड़ा। स्पॉन्सर मिलते नहीं थे। लेकिन धीरे-धीरे संघर्ष रंग दिखाने लगा। विश्व स्तर पर शायद ही कोई प्रतियोगिता हो जो कोनेरू ने न जीती हो। वो दुनिया की सबसे कम उम्र की इंटरनेशनल ग्रैंडमास्टर भी हैं। अब तो सफलताएं उनके कदम चूम रही हैं। वो अपनी शालीनता, आत्मविश्वास और लक्ष्य की दृष्टि से यंग इंडिया के लिए रोल मॉडल हैं।

सानिया मिर्जा

स्टाइल भी और हॉट भी। मीडिया की क्या कहें, लोगों की निगाह में सानिया मिर्जा की छवि ऐसी है। देश का बच्च-बच्च उनका नाम जनता है। वो देश की गिनीचुनी खिलाड़ियों में हैं, जिन्होंने नाम, काम और दाम तीनों में खासी सफलता पाई है। 2003 में उन्होंने सही मायनों में अपना टेनिस करियर शुरू किया। जब वो 2005 में पहली बार आस्ट्रेलियन ओपन में उतरीं तो पूरा मीडिया उनके पीछे था।  दर्शकों की भीड़ उनके मैच में टूट पड़ी। पहले दो मैचों की जीत ने ही मानो उन्हें स्टार बना दिया। तीसरे राउंड में हालांकि वो सेरेना विलियम्स से हार गईं। लेकिन टेनिस सर्किट में एक ऐसी खिलाड़ी की एंट्री हो चुकी थी, जिसमें खासी ग्लैमर अपील थी। शायद यही कारण है कि बाद के सालों में वो कोर्ट से ज्यादा एड फिल्मों में नजर आईं। रैंकिंग में 27वें नंबर तक पहुंचने के बाद उनकी रैंकिंग गिरने लगी। चोटों ने उन्हें परेशान किया। विवादों से भी खूब दो-चार हुईं। अब लग रहा है कि वो सिंगल्स के बजय डबल्स की ओर रुख करनेवाली हैं। इसी साल वे महेश भूपति के साथ आस्ट्रेलियन ओपन का मिक्स्ड खिताब जीत चुकी हैं।

मिताली राज

जिस तरह टीम इंडिया में राहुल द्रविड़ मिस्टर डिपेंडेबल माने जते रहे हैं, वसी ही इमेज वुमन क्रिकेट में 26 वर्षीया मिताली राज की है। टेस्ट क्रिकेट हो या वन-डे, सबमें मिताली ने अपनी धाक जमाई है। उन्हें उनकी शानदार बैटिंग के लिए याद रखा जता है। वुमन क्रिकेट में उनकी कुछ पारियों को तो उनके प्रशंसक कभी नहीं भूलते। टांटन में इंग्लैंड के खिलाफ दूसरे टेस्ट में उनकी 214 रनों की पारी मिसाल बन चुकी है। लंबे समय तक मिताली वुमन इंडियन टीम की कप्तान रहीं, जिसमें उन्होंने टीम को बड़ी सफलताएं दिलाईं, तो कुछ टूर वाकई ऐसे रहे, जिन्हें कोई याद करना नहीं चाहेगा। लेकिन ये तय है कि भारतीय महिला क्रिकेट अगर आज किसी मुकाम पर है तो उसका काफी Þोय मिताली राज को ही दिया जना चाहिए। मिताली कड़ी मेहनत पर विश्वास करती हैं। उनका मानना है कि मेहनत का कोई विकल्प नहीं। कुछ दिनों बाद वुमन टीम जब इंग्लैंड में वर्ल्ड टी-20 कप में खेल रही होगी तो ढेरों निगाहें उन्हीं पर लगी होंगी।

सायना नेहवाल

बैडमिंटन कोर्ट की आक्रामक सायना नेहवाल और उससे बाहर की सायना में जमीन आसमान का अंतर है। इस देश को पहली बार उनके रूप में ऐसी बैडमिंटन खिलाड़ी मिली है, जिनमें अपार संभावनाएं हैं। वो वल्र्ड टॉप टेन में हैं। वर्ल्ड  बैडमिंटन फेडरेशन 2008 में उन्हें मोस्ट प्रॉमिसिंग प्लेयर का अवॉर्ड दे चुका है।

कोर्ट पर वह किसी खिलाड़ी से नहीं घबरातीं, चाहे वो कितना ही दमदार क्यों न हो। यही उनकी सफलता का राज है। कोर्ट पर अपनी जबरदस्त मेहनत के लिए वो अपने कोचों तक को चकित कर चुकी हैं। उनके खेल में कमियां न रही हों ऐसा भी नहीं है, लेकिन उनकी खासियत ये है कि वो इन्हीं कमियों से सीखती रही हैं। बीजिंग ओलंपिक 2008 में क्वार्टर फाइनल तक के सफर में उन्होंने कई बड़े उलटफेर किये। ये अब भी जारी है। उनके कोच पुलेला गोपीचंद कहते हैं, ‘सायना हमेशा हंड्रेड परसेंट नहीं, बल्कि टू हंड्रेड परसेंट करने में विश्वास रखती हैं।’ हाल ही में भारत ने जब सुदीरमन कप के वर्ल्ड ग्रुप दो में पहुंचकर इतिहास बनाया तो उसके पीछे भी सायना का दमदार प्रदर्शन ही था।

 

 

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