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साइलेंट किलर है ग्लूकोमा

अंधापन के लिए ग्लूकोमा दूसरा सबसे बड़ा कारण है। इससे भी खतरनाक बात यह है कि इस रोग का पता भी व्यक्ति को देर से लगता है। आंखों की आधी से ज्यादा कोशिका जब नष्ट हो जाती है तब जाकर व्यक्ति को अपने आंखों में कमी का पता चलता है। सेंटर फॉर साइट के ग्लूकोमा विभाग के निदेशक डा. हर्ष कुमार बताते हैं कि वैश्रि्वक स्तर पर ग्लूकोमा के कारण 4.2 मिलीयन लोग नेत्रहीनता के शिकार हो गए हैं और एक अनुमान के मुताबिक यह संख्या 2020 तक 11.2 मिलियन हो जाएगी।

तीन तरह के होते हैं ग्लूकोमा

डा. हर्ष, दयाल आई सेंटर के डा. संजीव बिसला एवं आहूजा आई हॉस्पीटल के डा. हितेन्द्र आहूजा बताते हैं कि ग्लूकोमा तीन तरह के होते हैं।

क्रोनिक ग्लूकोमा : यह सबसे ज्यादा होता है। इस ग्लूकोमा के शिकार मरीज के आंखों की रोशनी धीरे-धीरे नष्ट होती जाती है। इस ग्लूकोमा में मरीज को किसी भी तरह का दर्द नहीं होता है।

एक्यूट ग्लूकोमा : इस ग्लूकोमा के तहत आखों से निकलने वाले पानी का बहाव तेज हो जाता है। यह आंखों के ड्रेन सिस्टम के बंद होने के कारण होता है। इस ग्लूकोमा में लेंस के पीछे की पतली-पतली रक्त नालिका भी नष्ट होने लगती है। इस ग्लूकोमा की सर्जरी जितनी जल्दी हो करा लेना चाहिए।

जन्मजात ग्लूकोमा : यह ग्लूकोमा बच्चे को जन्म के साथ ही होता है। इस तरह के ग्लूकोमा लगभग दस हजार बच्चों में से एक बच्चे में पाया जाता है। डा. संजीव बिसला बताते हैं कि यदि घर में ग्लूकोमा से पीड़ित कोई बच्चा जन्म लेता है तो उस घर में इस रोग के होने के तीन फीसदी उम्मीद होती है। यह संख्या यदि दो हो तो फिर इस रोग की उम्मीद पच्चीस फीसदी हो जाती है।

ग्लूकोमा के लक्षण

डा. हर्ष बताते हैं कि क्रोनिक ग्लूकोमा के मरीज के चश्मे का नंबर तेजी से बदलता है। अंधेरे में मरीज आंखों से ज्यादा बेहतर महसूस करता है। दिखाई देने वाले वस्तु या हिस्से के चारो ओर गोलाई से धुंधला दिखाई देना, सिर दर्द करना, आंखों के ऊपरी रंग हल्का ब्लू होना आदि लक्षण पाए जाते हैं। तो एक्यूट ग्लूकोमा में आंखों में तेज दर्द होना, रोशनी में धूंधलापन दिखना, जी मिचलाना आदि के लक्षण दिखते हैं। इसी तरह जन्मजात ग्लूकोमा में बच्चे अपने आंख को धूप या तेज रोशनी में बंद रखते हैं। आंखों से पानी आते रहते हैं।

क्या है ग्लूकोमा का इलाज?

डा. हर्ष बताते हैं कि ग्लूकोमा के सबसे बड़ा इलाज है सतर्कता। व्यक्ति को समय-समय पर आंखों की जांच करते रहना चाहिए। बड़ों में यह 40 वर्ष के बाद ज्यादा प्रभावी होता है। ग्लूकोमा का पता चलते ही इसकी जितनी जल्दी हो कुशल विशेषज्ञ से आपरेशन करा लेना चाहिए।

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