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बिहार में अब भी बची है भाषा की शुद्धता

देश के जाने-माने कवियों की मानें तो बिहार आते ही उनमें एक नयी ऊर्जा भर जाती है। वजह यह है कि यहां के लोग उनकी बातों को ज्यादा समझते है। बिहार ही वह धरती है जहां भाषा की शुद्धता बची हुई है। यहां के लोग साहित्यप्रेमी और संजीदा है। यहां व्यंग्यात्मक कविताएं ज्यादा पसंद की जाती है, क्योंकि व्यवस्था के खिलाफ यहां के लोग लड़ते रहे है। ये अनुभव हैं देश के विभिन्न हिस्सों से भागलपुर आए जाने-माने कवियों सरिता शर्मा, सुरेश अवस्थी, ओम व्यास, प्रवीण शुक्ला और डा. कुंवर बेचैन के। ये सोमवार को दैनिक जागरण से बातचीत कर रहे थे। लोकप्रियता के लिए फूहड़पन को दिये जा रहे बढ़ावे पर इनमें विरोधाभास है, लेकिन इतना ये स्वीकारते है कि फूहड़पन को जितना प्रचारित किया जा रहा है, स्थिति वैसी नहीं है।

सरिता शर्मा कहती है कि बिहार और पूर्वी उत्तरप्रदेश को छोड़ देश के अन्य हिस्सों की स्थिति अब बदल गयी है। मंच पर अगर महिलाएं है तो सामने बैठे श्रोताओं की अपेक्षा होती है कि वह अपनी रचनाओं के जरिये वैसा आनंद दें जो उन्हे 'मुजरों' में मिलता है। बदली इस मानसिकता की कद्र करने में फूहड़पन के पांव पसरते जा रहे है। सच तो यह है कि जब हम मंच पर हों तो हमें सरलता, शालीनता और शुद्धता बनाये रखनी चाहिए। श्रोताओं की तालियां बटोरने के लिए हमें हल्का नहीं होना चाहिए।

एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि जहां पैसा और ग्लैमर आ जाएगा वहां तो करप्शन होगा ही। आज कवि दो तरह के है। एक है जो जन्मजात है। उनकी सोच में गहराई है। एक है जिन्होंने मंच पर पैसे और ग्लैमर देखे और इस रास्ते को अपना लिया। ऐसे लोगों के कारण ही अश्लीलता को जगह मिली। नतीजा यह हुआ कि अच्छे लोग घर में दुबक गये। लाफ्टर चैलेंज को ही लें। यह कैसा मंच है यह आजतक मैं नहीं समझ पायी। इसे कवियों के मंच का विकृत रूप भी हम नहीं कह सकते।

सुरेश अवस्थी से जब यह पूछा गया कि बिहार की आप इतनी प्रशंसा कर रहे है, बावजूद इसके लंबे अंतराल के बाद भी यह राज्य एक स्तरीय कवि पैदा नहीं कर सका? उन्होंने कहा, संक्रमण काल से सभी को गुजरना होता है। ऐसा नहीं है कि कुछ सालों में कोई नाम नहीं उभरा तो यहां लिखा-पढ़ा नहीं जा रहा है। आपको यह नहीं भूलना चाहिए कि यह रामधारी सिंह दिनकर की भूमि रही है। कवियों में फूहड़पन की बातों को उन्होंने स्वीकारा, साथ ही यह भी कहा कि हालात की तुलना में आरोप ज्यादा है। ऐसे आरोप लोगों के कम है, मीडिया के ज्यादा। समय के साथ जब पूरा समाज बदला तो कविता में बदलाव क्यों नहीं आना चाहिए। आजादी के पहले राष्ट्रचेतना जागृत आधारित कविताएं लिखी जाती थीं। आजादी जब मिली और सपना टूटा तो आक्रोश पर आधारित कविताओं को बढ़ावा मिला। आक्रोश से जब हल नहीं निकला तो व्यंग्यात्मक कविताओं को जगह मिली। यह दौर हास्य और व्यंग्यात्मक कविताओं का है। हास्य-व्यंग्य विसंगतियों से पैदा होता है। आज हर क्षेत्र में विसंगतियां जगह बना रही है।

ओम व्यास कहते है कि बिहार में व्यवस्था के प्रति लोगों में आक्रोश है। यही वजह है कि व्यंग्य कविताओं से यहां के लोग जुड़ जाते है। एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि कवि मतलब रचना करने वाला होता है। बिहार जितना आईएएस और आईपीएस दे रहा है वह भी तो रचना ही कर रहे है।

प्रवीण शुक्ला कहते है कि मनोरंजन की दृष्टि से आज भी कविता का मंच सस्ता है। एक मंच से इतनी विविधताएं आपको नहीं मिलेंगी। अन्य आयोजनों से आंखें संतुष्ट हो सकती है और कविताएं मन की भूख मिटाती हैं।

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