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..यहां तक आते आते सूख जती हैं सभी नदियां

..यहां तक आते आते सूख जती हैं सभी नदियां

देश की राजधानीं में जीबी रोड पर रहने वाली वेश्याओं को 62 वर्षो के बाद पहली बार वोटर कार्ड नसीब हुआ है, यानी अब उनकी भी कोई पहचान होगी। लेकिन क्या राजनीतिक पार्टियां उनके भले के लिए भी सोचेंगी या फिर उन्हें भी महज वोट बैंक के रूप में ही देखा जएगा।

कवि और शायर दुश्यंत कुमार का एक शेर है:
यहां तक आते-आते सूख जती हैं सभी नदियां,
हमें मालूम है पानी कहां ठहरा हुआ होगा।

यह शेर कम से कम दिल्ली के जीबी रोड की वेश्याओं के जीवन पर पूरी तरह लागू होता है। यकीन नहीं होगा, पर यह सच है कि जीबी रोड, जिसे Þाद्धानंद मार्ग के नाम से भी जना जता है, में रहने वाली लगभग 4000 वेश्याओं के पास इस लोकसभा चुनावों से पहले तक कोई वोटर कार्ड नहीं था। और 62 वर्ष में पहली बार यहां रहने वाली लड़कियों को वोटर कार्ड नसीब हुआ है और इन्होंने पहली बार अपने मतों का प्रयोग किया है।

गौरतलब है कि दिल्ली में 116 कोठे और 25 बिल्डिंगों में 4000 वेश्याएं रहती हैं, जिनमें से 1300 वेश्याओं का वोटर कार्ड हाल ही के लोकसभा चुनावों से पहले बना है। इन वेश्याओं में से 90 प्रतिशत ने इन चुनावों में अपने मतों का प्रयोग किया है, इस उम्मीद पर कि शायद देश के आकाओं का ध्यान उनकी समस्याओं पर भी जएगा। वोट देने के बाद बरबस ही यहां रहने वाली लड़कियों के दिलों में ना जने क्यों कुछ सपने आकार लेने लगे हैं।     

36 वर्षीया कांता का कहना है कि जवानी में तो किसी ने हमारा हाथ पकड़ा नहीं, अब बुढ़ापे में क्या कोई हमारा पकड़ेगा। बस हमारे बच्चों के बारे में कोई सोच ले, उनकी अच्छी पढ़ाई हो जए तो हम समङोंगी कि हमारी जिन्दगी सफल हो गई। हम बस इतना ही चाहते हैं नयी सरकार से। लेकिन यह बोध यहां रहने वाली वेश्याओं के भीतर हल्का-सा गर्व भी पैदा करता है कि देश के इतिहास में पहली बार सरकार चुनने में उनकी भी भूमिका रही है। वेश्याओं और उनके बच्चों के उद्धार के लिए काम करने वाले संगठन ‘भारतीय पतिता उद्धार समिति’ की दिल्ली यूनिट की उपाध्यक्ष नसरीन कहती हैं, ‘हमने तो जसे-तैसे पूरी जिंदगी काट दी, लेकिन अब हमें उम्मीद है कि हमारे बच्चों को जिल्लत की जिंदगी नहीं जीनी पड़ेगी। मैंने भी वोट दिया है। मैं चाहती हूं कि मेरे चारों बच्चे अच्छे स्कूलों में पढ़ें और वे भी डॉक्टर-वकील बनें।’

कोठे के एक कोने पर बैठी बूढ़ी हो चुकी 64 साल की नफीसा (बदला हुआ नाम) ने इस उम्मीद पर वोट दिया है कि उन्हें भी वृद्धावस्था पेंशन मिले। जीबी रोड पर वेश्यावृत्ति करते हुए अपनी जवानी के 10 साल गवां चुकी शाबिया, रानी (बदले हुए नाम) के चेहरों पर सरकार, स्वयंसेवी संगठनों व समाज की उपेक्षा के प्रति आक्रोश साफ देखा ज सकता है। बकौल शाबिया, नेता लोग बड़े-बड़े वादे कर जते हैं। सेक्स वर्करों के नाम पर विश्व स्वास्थ्य संगठन और सरकार से करोड़ों रुपए डकारने वाले अनेक संगठनों के कर्ताधर्ता भी बातें तो बहुत करते हैं, लेकिन ना जने क्यों हम लोगों के हक में होता कुछ भी नहीं। वेश्याओं का वोटिंग कार्ड बनवाने में अहम भूमिका निभानेवाले भारतीय पतिता उद्धर समिति के अध्यक्ष खराती लाल भोला कहते हैं कि वेश्याएं कोठा मालकिन की बंधुआ मजदूर हैं। कोठा मालकिन इनका वोटिंग कार्ड नहीं बनने देती थीं। वेश्याओं का पैसा सात भागों में (दलाल, कोठा मालकिन, पुलिस, हफ्ता वसूली करने वाले गुंडों, राशन कार्ड मालिक, सूद खोर, डॉक्टरों) में बंट जता है। इनका वोटिंग पहचान पत्र बनने से इनकी अनेक समस्याएं दूर हो पाएंगी। अब सूदखोर इनसे मनमाना ब्याज नहीं ले पाएंगे। ये महिलाएं बैंक में खाता खोल सकती हैं। चाहे तो लोन भी ले सकती हैं। पहचान पत्र होने से ये अपनी समस्याओं को पुलिस  व सरकारी स्तर तक भी पहुंचा सकती हैं।

भारतीय पतिता उद्धार समिति दिल्ली यूनिट के सचिव इकबाल आलम का कहना है कि इन वेश्याओं को सरकार से आशा है कि वो कोठा मालकिनों से उन्हें छुटकारा दिलाएगी। छुटकारा दिलाने के लिए सरकार सेक्स वर्कर्स को लाइसेंस उपलब्ध करवाएगी। क्योंकि अवध काम की आड़ में सेक्स वर्कर्स पर शारीरिक और मानसिक रूप से अत्याचार होता है। लाइसेंस मिलने के बाद वेश्यावृत्ति को इसी जीबी रोड तक सीमित किया ज सकता है। इनकी बीमारियों का इलाज होगा, ऐसी यहां की वेश्याओं को उम्मीद है। यह उम्मीद कितनी पूरी होगी, यह तो आने वाला समय ही बतायेगा। लेकिन उम्मीद की जनी चाहिए कि ेवेश्याओं के वोटर कार्ड बनवाना महज राजनीतिक प्रपंच ही साबित नहीं होगा और राजनातिक लोग सचमुच यहां के हालात बदलने की कोशिश करेंगे।

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