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मंत्रालयों के झगड़े और नई उम्मीद

मंत्रिमंडल में भी कुछ विभागों   को और कुछ कुर्सियों  को बाकी की तुलना में मूल्यवान माना जाता है। सारी रस्साकशी इसी को लेकर चलती है। अब इस बात का वक्त आ गया है कि हम बदले माहौल में जब एक नई शुरुआत का मौका मिल रहा है ठंडे दिमाग से इस सब पर सोच-विचार करें। सबसे पहली बात यह समझने की है कि मंत्री बनना क्यों महत्वपूर्ण है? वह अपने महकमे का मुखिया होता है और वरिष्ठतम सरकारी अफसर भी उसके मातहत होता है।

अपने मंत्री से बिगाड़ कर कोई भी आला अफसर आईएएस हो या कुछ और अपनी गद्दी पर बना नहीं रह सकता। समझदारी इसी में है कि मंत्री महोदय के जायज या नाजायज पांच-दस मन चाहे काम करवा कर अपनी मनमानी बाकी तमाम मुद्दों पर बरकरार रखी जा सके। अपने मंत्रालय में नियुक्तियों तबादलों को प्रभावित करने के अलावा मंत्रालय के लिए आवंटित राशि का एक बड़ा हिस्सा अपने निर्वाचकों को खुश करने के लिए किया जा सकता है।

अगर आप खुद ही मंत्री न बन पाये ताे फिर दूसरे किसी को उपकृत कैसे कर सकते हैं। ज्यादा से ज्यादा अपनी पार्टी के किसी मंत्री से सिफारिश भर करने की गुंजाइश बची रह जाती है। इतनी ही महत्वपूर्ण बात यह समझना भी है कि सिर्फ मंत्री बनना काफी नहीं मंत्रालय भी वज¸नदार होना चाहिए अन्यथा मंत्री की औकात संतरी से ज्यादा नहीं रह जाती। मंत्रालयों के (केन्द्र में) वज¸न को तोलने के दो तरीके है। विदेश मंत्रालय, गृह मंत्रालय, रक्षा मंत्रालय और वित्त मंत्रालय ऐसे विभाग हैं कि उन्हें संभालने वाला कैबिनेट मंत्री ही नहीं, उसके साथ जुड़े राज्य मंत्री भी महत्वपूर्ण और उदीयमान समझे जाते हैं।

पद-प्रतिष्ठा के आधर पर महिमा-मंडन यहीं समाप्त हो जाता है। इसके बाद कमाने-खाने और मिल बांटकर पचाने वाले मंत्रालयों को महत्वपूर्ण समझा जाता है। कमाई वाले मंत्रालयों में रेल मंत्रालय सर्वोपरि है। न केवल रेल की पटरियों का जाल देशभर में फैला है इस विभाग के कर्मचारियों की संख्या भी सरकारी कर्मचारियों की कुल संख्या का बहुत बड़ा हिस्सा है। इस मंत्रालय के महत्व को इस बात से आंका जा सकता है कि यह अपनी कमाई और खर्च का बजट अलग से कमोबेश स्वाधीन रूप से पेश करता है।

कोई भी रेल मंत्री अपने मतदातओं को या निर्वाचन क्षेत्र के निवासियों को सुखी संतुष्ट करने के लिए रेल गाड़ियां चलवा सकता है, नये कारखाने शुरू करवा सकता है या विभागीय मुख्यालयों को स्थानांतरित कर सकता है। पासवान हाे या लालू, माधव राव सिंधिया हों या कोई और, सभी के कार्यकाल में यह प्रवृत्ति देखने को मिलती रही है। इसी कारण आज भी डीएमके और त्रृणमूल कांग्रेस रेल मंत्रालय काे लेकर एक-दूसरे को धकियाने और पछाड़ने में लगे थे।

पुराने जमाने में जब हमारी जिंदगी लांइसेंस परमिट राज में गुजरती थी, तब कुछ और मंत्रालय महत्पूर्ण समझे जाते थे जैसे वाणिज्य और उद्याेग। आज भूमंडलीकरण और आर्थिक सुधरो के सूत्रपात के बाद इनका अवमूल्यन स्वाभाविक है। विडंबना यह है कि आज भी न तो उद्योगों का विकास निरर्थक समझा जा सकता है और न हीं अंतरराष्ट्रीय व्यापार वाणिज्य से हासिल हाे सकने वाली समृद्धि काे खारिज¸ किया जा सकता है। इन मंत्रालयों काे सिर्फ वक्त काटने का और बेहतर दिनों के इंतजार का मौका समझा जाता है क्योंकि बदली परिस्थितियों में दोस्तो को उपकृत करने और दुश्मनों को दंडित करने के अवसर यहां नहीं बचे रहे।

गनीमत है कि इस्पात, पेट्रोलियम, उर्जा आदि मंत्रालय आज भी पीठासीन मंत्री को इस धरा पर रहते ही कुछ स्वर्गीय सुख भाेगने का मौका देते हैं। भले ही पिछले दिनो सरकार ने विधिवत सार्वजनिक क्षेत्र काे दरकिनार करने का प्रयत्न किया है और निजीकरण तथा विनिवेश काे लगातार बढ़ावा दिया है तब भी अनेक ऐसे बड़े-छोटे नवरत्न बचे हैं, जिनकी चकाचौंध सत्तासुख लोलुप नेताओं को आकर्षित करती रहती है।

गेल-सेल, ओएनजीसी-एनएचपीसी सिर्फ चुनिंदा उदाहरण हैं, जिनका वर्णन और दोहन कामधेनु के रूप में किया जाता है। सरकार चाहे किसी भी दल या गठबंधन की हो। मनचाहे प्रियपात्र काे इसीलिए इन फायदेमंद थानों की थानेदारी सौंपी जाती है। कुछ-कुछ ऐसा ही हाल कोयला मंत्रालय का भी है। किसी को भी इसकी दलाली से या इसकी बोरियां से भरी कोठरी में जाने से रत्तीभर परहेज¸ नहीं होता। शिबू सोरेन के राजनैतिक जीवन में जो दो धुरियां हैं, उनमें से एक झारखंड का मुख्यमंत्री पद है तो दूसरा कोयला मंत्रालय।

हम यह समझने में हमेशा असमर्थ रहे हैं कि क्यों आम आदमी की जिंदगी से जुड़े मंत्रालयों को गरिमाविहीन, खस्ताहाल और सौतेली संतान की तरह बेकार समझा जाता है और इनकी उपेक्षा की जाती है। डॉ. मनमाेहन सिंह के पिछले कार्यकाल में मानव संसाधन मंत्रालय की जो दुर्दशा हुई थी और स्वास्थ्य मंत्रालय की जो दुर्गति देखने को मिली थी, उसके लिए दो नितांत अक्षम और अनुपयुक्त मंत्रियों की नियुक्ति को ही जिम्मेदार समझा जा सकता है।

अंबूमणि रामदौस ने अकेले ही अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान की तबाही कर दिखाई और अर्जुन सिंह ने सुर्खियो में छाये रहने के लिए मंडल का कमंडल अपने हाथ में थाम लिया और अल्पसंख्यक तुष्टीकरण काे अश्वमेध अभियान का रूप दे डाला। जिस जामिया को उन्होंने भरपूर समर्थन और सहायता से बढ़ावा दिया, वहीं की एक सड॥क का नामकरण अपने लिए करवाने में उन्हें कोई संकोच नहीं हुआ। यूजीसी की जाग¸ीर को हाथ से न जाने देने के लिए उन्होंने नॉलेज कमीशन को बधिया बनाने में कोई कसर न छोड़ी। कभी इस पद पर मौलाना आजाद जैसे कद्दावर और सुयोग्य विद्वान विराजते थे। सच है व्यक्ति से काेई भी पद गरिमा प्राप्त करता है। पद के सहारे ताकतवर बनने की काेशिश करने वाला अंततः बौना ही सिद्ध हाेता है।

कृषि मंत्रालय, ग्रामीण विकास मंत्रालय, महिला एवं शिशु कल्याण मंत्रालय तथा पंचायती राज मंत्रालय हमारी समझ में किसी भी मंत्रालय से कम महत्वपूर्ण नहीं समझे जा सकते। जिन व्यक्तियों काे इनकी जिम्मेदारी सौंपी जाती है उन्हें गृहरक्षा वित्त या विदेश मंत्री से कम महत्वपूर्ण कतई नहीं समझा जाना चाहिए। इसे दुर्भाग्य ही समझा जा सकता है कि जब शरद पवार को कृषि मंत्रालय सौंपा गया तो इसे उनके पर कुतरने जैसे माना गया और जब मणिशंकर अय्यर का तबादला पेट्रोलियम मंत्रालय से पंचायती राज में किया गया तो इसे उनकी पदावनति के रूप में प्रचारित किया गया। यह उल्लेखनीय है कि मणि के पास पंचायती राज के अलावा उत्तर-पूर्वी राज्यों की अतिरिक्त जिम्मेदारी भी थी।

जब भी मंत्रिमंडल का गठन हाेता है या उसमें फेर-बदल होता है तो ताश की पुरानी गड्डी को तरह-तरह से फेंट करवही बादशाह बेगम गुलाम रख दिये जाते हैं। नये चेहरों को पुराने जैसे पिटे-पिटाये मोहरों में बदलते देर नहीं लगती। आला अफसरों के तेवर जस के तस ही रहते हैं, वे खुद को मंत्री और राजनेता को आलाकमान के संतरी से ज्यादा कुछ नहीं समझते। जब आज नई शुरुआत की बात चल रही है, तब क्या यह उम्मीद करना व्यर्थ है कि अब बढ़ी पारदर्शिता और जवाबदेही के साथ वाकई कुछ फर्क पड़ेगा?

pushpeshpant @gmail. com

लेखक जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में प्राध्यापक हैं।

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