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समाज को बेहतर बनाने की आस

हर व्यक्ित का चीजों को देखने का अपना एक अलग नजरिया होता है, जो सभी को सही या गलत सोचने पर मजबूर करता है। हमारे समाज में लोग कई मुद्दों पर काम कर रहे हैं। पर बहुत कम लोग हैं, जो लोगों की सोचने-समझने की, व्यक्ित के अहं, उसके दिलो दिमाग से जुड़े मुद्दों को गंभीरता से लेते हैं और उन पर काम करते हैं।

मानवीय मूल्यों को सवरेपरि मानते हुए मानव समाज के मन को पढ़ने और गढ़ने में जुटी ऐसी ही एक महिला हैं, वर्षा गोयल, जिन्होंने इस मुद्दे पर काम करने का बीड़ा उठाया। वर्षा के इस काम में उन्हें अपने परिवार विशेषकर अपने पति विरेन्द्र कुमार का पूरा सहयोग मिला।

बस, फिर क्या था। वर्षा के सपनों को मानो पंख लग गए। उन्होंने सन् 2004 में ‘आस’ नामक संस्था का गठन किया और अपने काम को बखूबी अंजाम दे रही हैं।

वर्षा ने जब सन् 1984 में लक्ष्मीबाई कॉलेज से ग्रेजुएशन की थी तो उन्होंने सोचा भी नहीं था कि एक दिन ऐसा काम करेंगी, जो देश-समाज के हित में होगा और स्वयं उन्हें भी आत्मसंतुष्टि देगा। संस्था का गठन उस वक्त उनके लिए एक सपना ही था।
संस्था के शुरुआती दौर में उन्हें कई तरह की आलोचनाओं का सामना करना पड़ा, परन्तु उन्होंने अपने आत्मविश्वास को डिगने नहीं दिया। इसी के परिणाम स्वरूप आज कई जाने-माने लोग उनकी इस संस्था से जुड़े हुए हैं और उनका हौसला बढ़ाते हैं। 7 अन्य व्यक्ित और कई स्वयंसेवी भी वर्षा के इस पुनीत कार्य में उनकी सहायता करते हैं।

‘आस’ नामक यह संस्था लोगों के सोचने-समझने के नजरिये को एक नई राह दिखाती है, ताकि वह बुरी चीजों में भी अच्छाई खोज सकें। इस संस्था की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह छोटे-छोटे मुद्दों पर काम करती है। वर्षा का मानना है- ‘अगर हम छोटे मुद्दों को सुलझएंगे तो बड़ी समस्याएं खुद-ब-खुद सुलझ जाएंगी’।

वर्षा ने अपनी संस्था के साथियों के साथ मिलकर स्वास्थ्य, शिक्षा, जल संरक्षण, खाद्य प्रशिक्षण, मानवीय आचार-व्यवहार और डिप्रेशन से संबंधित कई सेमिनार और कैम्प आयोजित किए हैं। उनके इसी काम को देखकर कई प्राइवेट डोनर, पंजाब नेशनल बैंक और आई.डी.बी.ई. बैंक ‘आस’ की आर्थिक रूप से मदद करते हैं।

‘आस’ कई गरीब बच्चों की पढ़ाई और स्वास्थ्य का खर्चा भी उठाती है, जो घर की आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण पढ़ाई पूरी नहीं कर पाते। ‘आस’ पहली संस्था हैं, जिसने 10वीं और 12वीं कक्षा के छात्रों के लिए सेमिनार करवाए, ताकि बोर्ड की परीक्षा देने वाले छात्र डिप्रेशन में ना आएं, क्योंकि कई बच्चे अच्छे अंक ना लाने के कारण और घर के दबाव में आकर आत्महत्या जैसे कदम उठा लेते हैं।

वर्षा ने संस्था में काम करने के दौरान ही सन् 2008 में ‘खुद से दो बातें’ नामक एक किताब भी लिखी, जिसमें उन्होंने जीवन को जीने के सकारात्मक नजरिए को सरल भाषा में समझया है।

वर्षा अपने इस काम से आज बेहद खुश हैं और चाहती हैं कि हर व्यक्ित अपने सपनों की पूरा करे और देश समाज के काम आए। अगर आप वर्षा गोयल से संम्पर्क करना चाहें तो आप ५्र१ील्ल१िीि’ें्र’.ूे पर मेल कर सकते हैं।

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