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हम जैसा करेंगे कर्म

यजुर्वेद में कर्म को प्रमुख मानते हुए जन्मगत ऊंच-नीच की धारणाओं का खंडन किया गया है। अलंकारिक वर्णन करते हुए मंत्र में कहा गया है समाजरूपी शरीर में ब्राह्मण (विद्वान) मुख के समान होता है, क्षत्रिय भुजाओं के समान, वैश्य पेट के समान और शूद्र पैर के समान होता है। यानी जिस प्रकार से शरीर के हर अंग का बराबर का महत्व है उसी प्रकार से समाज में हर वर्ण के व्यक्ति का बराबर का महत्व है।

जन्म के आधार पर ऊंच-नीच की मान्यताएं न तो तर्क संगत हैं और न वेद सम्मत ही। मतलब कर्मों से ही इंसान अच्छा-बुरा होता है, जन्म के आधार पर नहीं। संत तुलसीदास ने भी लिखा है- कर्म प्रधान विश्व करि राखा, जो जस करई सो तस फल चाखा। कर्मों से ही इंसान की पहचान होती है। इस जन्मगत जात-पात की बातों में कोई दम नहीं है। ईश्वर और कुदरत के सामने हर इंसान बराबर है। वह इंसान ही कुदरत के लिए सबसे प्यारा है, जो प्राणीमात्र से प्यार करता है।

अपने स्वार्थ के लिए दूसरों के स्वार्थ को नुकसान नहीं पहुंचाता। इंसानियत ही जिसका मजहब एवं धर्म है। भर्तृहरि के मुताबिक चार तरह के इंसान होते हैं। एक वे होते हैं, जो अपने स्वार्थ का नुकसान करके भी दूसरों के हित में लगे रहते हैं और इसमें ही वे आनन्द का एहसास करते हैं। ऐसे लोगों को देवता कहा गया है। दूसरे तरह के इंसान वे होते हैं, जो अपने स्वार्थ को साधते हुए दूसरे के स्वार्थ को साधने के लिए तैयार रहते हैं, ऐसे लोगों को मानव कहा गया है।

तीसरे तरह के इंसान वे होते हैं जो अपने स्वार्थ के लिए दूसरों का ज्यादा से ज्यादा नुकसान करने के लिए हर वक्त तैयार रहते हैं, ऐसे लोगों को शैतान कहा गया है और चौथे तरह के वे लोग होते हैं, जो बिना किसी वजह दूसरों का नुकसान करने में आनंद का एहसास करते हैं। ऐसे लोगों को क्या कहा जाए, भर्तृहरि कहते हैं, इनके लिए शब्दकोष में कोई शब्द ही नहीं है। मतलब ये चार तरह के लोग समाज में अपने गुण कर्म एवं स्वभाव के मुताबिक जाने जाते हैं। विचार अपने जीवन को ही बेहतर नहीं बनाते, बल्कि इससे परिवार एवं समाज में अनुकूलता आती है। कर्म जिंदगी को ऊंचाई देते हैं तो बिना विचारे किए कर्म से जिन्दगी बर्बाद भी हो जाती है।

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