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एक रुका हुआ फैसला

केन्द्रीय मंत्रिमंडल का विस्तार बंगाल में आए चक्रवात की वजह से टला हो या किसी और वजह से, लेकिन यह स्पष्ट है कि इस बार मंत्रिमंडल का गठन तूफान में घिरा हुआ है। इसीलिए पहली बार प्रधानमंत्री के साथ सिर्फ उन्नीस मंत्रियों ने शपथ ली और उसके बाद न सिर्फ मंत्रिमंडल का विस्तार नहीं हो पाया, शपथ लिए हुए सारे मंत्रियों को विभाग भी नहीं दिए गए। मंत्रिमंडल को लेकर प्रधानमंत्री पर सहयोगी दलों का दबाव तो है ही, उनकी अपनी पार्टी में भी काफी उठापटक, खींचतान है।

लेकिन इसे खराब नहीं मानना चाहिए, बल्कि यह एक नई प्रवृत्ति सूचक है और जाहिर है कि जब कुछ नया होता है तो छोटा-मोटा तूफान भी आता है। दरअसल पिछले दिनों भारतीय राजनीति में एक परिवर्तन आया है, जिसके स्पष्ट चिह्न इस चुनाव में दिखे। सबसे महत्वपूर्ण बात यह साबित हुई कि सुशासन की वजह से जनता का समर्थन मिलता है। ऐसे में प्रधानमंत्री के लिए मंत्रिमंडल बनाते वक्त मंत्रियों की काबिलियत और ईमानदारी का ख्याल रखना जरूरी हो गया है।

द्रमुक और कांग्रेस के नेता आधिकारिक रूप से कुछ भी कहें, द्रमुक के कुछ नेताओं की काबिलियत और ईमानदारी पर लगे प्रश्न-चिह्न उनके मंत्री बनने और कुछ विशेष विभाग मिलने में बाधक हुए हैं। ऐसे मुद्दे पर गतिरोध हमारी राजनीति में शायद ही कभी आया हो। इस चुनाव में बाहुबलियों के सफाए के बाद जनता की पैनी नजर अब भ्रष्टाचारियों पर रहेगी। पहले मंत्री बनाने में इलाकाई और जाति, धर्म वगैरह का संतुलन ही मुख्य रहता था।

अब भी ऐसा नहीं है कि उसका महत्व घट गया है, लेकिन व्यक्तिगत योग्यता का महत्व बढ़ा है, क्योंकि अगले चुनाव में सरकार का कामकाज सबसे बड़ा सवाल होगा। एम. करुणानिधि अपने विशाल परिवार के हितों और पार्टी के नेताओं की महत्वाकांक्षाओं को संतुलित करने में लगे हैं और सोनिया गांधी और प्रधानमंत्री इस बात में जुटे हैं कि मंत्रिमंडल की शक्ल सूरत विकृत न हो जाए। यही पेंच कांग्रेस के अंदर से मंत्री चुनने और उन्हें विभाग देने में है>

लोकतंत्र में यह स्वाभाविक और जायज है कि हर तरह के समूह को सही प्रतिनिधित्व मिले, लेकिन उसके साथ यह भी जरूरी है कि मंत्री ऐसे हों, जो अपनी जिम्मेदारी को ठीक से निभाएं। इस संतुलन को बिठाने में कहीं-कहीं समझौता भी करना ही पडे¸गा लेकिन इस बार प्रधानमंत्री इस स्थिति में हैं कि कम से कम समझौते करके काम चला लें। ऐसे में मंत्रिमंडल का गठन कुछ टल भी जाता है तो कुछ हर्ज नहीं, लेकिन यह जिम्मेदारी विजेताओं पर जनादेश ने सौंपी है कि वे नए भारत की आकांक्षाओं पर यथासंभव खरे उतरें।

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