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उत्तर कोरिया के इरादे

उत्तर कोरिया ने विश्व जनमत के खिलाफ खड़े होकर जो दूसरा नाभिकीय परीक्षण किया है, उसका एक इरादा घरेलू राजनीति में उत्तराधिकार के सवाल को आसानी से हल करना भी बताया जा रहा है। वहां के मौजूदा शासक किम जंग द्वितीय गंभीर तौर पर बीमार हैं और पिता की ही तरह सत्ता अपने परिवार के ही किसी सदस्य को सौंपना चाहते हैं। उनके संभावित उत्तराधिकारियों में बहनोई जेंग सियोंग तेइक और दो नालायक बेटों से अलग तीसरे नंबर के बेटे किम जंग उन प्रमुख हैं।

लेकिन उत्तराधिकार सहज रूप से हो जाए, इसके लिए सेना को खुश करने के इरादे से बीमार शासक ने उतने बड़े बम का परीक्षण कर दिया, जितना बड़ा अमेरिका ने नागासाकी पर गिराया था।  इस परीक्षण से उत्तर कोरिया न सिर्फ दक्षिण एशिया की सुरक्षा के लिए खतरा पैदा कर रहा है, बल्कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् सहित विश्व जनमत को ठेंगाभी दिखा रहा है। उसने पिछला परमाणु परीक्षण 2006 में किया था और उम्मीद की जा रही थी कि वह आगे ऐसा करने से परहेज करेगा।

लेकिन पिछले पांच अप्रैल को रॉकेट परीक्षण फिर 25 मई को परमाणु परीक्षण कर उसने यह जता दिया है कि वह परमाणु प्रसार करने पर आमादा है और पाकिस्तान व इजराइल की तरह ही विश्व परमाणु व्यवस्था को माने बिना, एक नाभिकीय शक्ति संपन्न राष्ट्र बनना चाहता है। उत्तर कोरिया के नाभिकीय इरादों को भांप कर उसे  समझाने के लिए सन 2003 से अमेरिका, चीन, दक्षिण कोरिया, जापान और रूस लगे हुए हैं। इस बीच कुछ शर्तें तय भी हुईं और कुछ पाबंदियां भी लगाई गईं।

लेकिन उसका रुख नरम पड़ने के बजाय लगातार सख्त होता चला गया। क्योंकि वह जानता है कि सुरक्षा परिषद् के पास उसे रोकने की ताकत नहीं है और चीन उस पर ज्यादा दबाव नहीं डाल रहा है। जबकि चीन वह देश है, जो उसे समझाने में अहम् भूमिका निभा सकता है। चीन परमाणु परीक्षण की निंदा तो कर देता है लेकिन उसे रोकने में वास्तविक भूमिका निभाने से बचता है। इसके विपरीत भारत ने अल्पकालिक तौर पर चीन की तरह परमाणु प्रसार तो नहीं ही किया है, वह दीर्घकालिक तौर पर परमाणु मुक्त विश्व का हिमायती भी है। ऐसे में किसी भी राजनयिक प्रयास में भारत को शामिल करना अपरिहार्य बनता जा रहा है।

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