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मुकुन्दवार गाँव में मिली टेराकोटा की मूर्तियाँ एवं अन्य सामग्री

बड़हलगंज क्षेत्र के जिस मुकुन्दवार गाँव में पिछले एक सप्ताह में छिटपुट खुदाई में ग्रामीणों को सोने-चाँदी के एक दजर्न से अधिक सिक्के मिले वह कोई मामूली नहीं बल्कि कुषाणकालीन सभ्यता वाला स्थान है। गोरखपुर विश्वविद्यालय के प्राचीन इतिहास, पुरातत्व एवं संस्कृति विभाग की एक टीम को मंगलवार को वहाँ से टेराकोटा की तीन मूर्तियाँ मिलीं जिनसे टीम बहुत उत्साहित हो गई है।

टीम के मुखिया डॉ. एसपी सिंह का कहना है कि उन्हें वहाँ से कुषाणकालीन सभ्यता के तथ्यात्मक प्रमाण मिल गए हैं। वह स्थान एक प्राचीन धरोहर है जिसकी रक्षा की जनी चाहिए। साथ ही सोने के सिक्के मिलने के प्रलोभन में ग्रामीणों द्वारा वहाँ पर की ज रही खुदाई पर रोक लगा देनी चाहिए। जबकि सचाई यह है कि टीम के सव्रे के दौरान भी गाँव के कुछ लोग यत्र-तत्र खुदाई कर रहे थे। अखबारवाले बड़हलगंज के कोतवाल से दो दिन से बात कर रहे हैं मगर उन्होंने खुदाई पर रोक लगाने की कोई पहल नहीं की।


‘हिन्दुस्तान’ की पहल पर जब गोविवि की टीम मंगलवार को उस गाँव में पहुँची तो कुछ देर की खोजबीन के बाद कुषाणकालीन टेराकोटा की तीन मूर्तियाँ, समान ईंटों पर निर्मित लगभग 500 मीटर लम्बी दीवार के अवशेष, ठप्पे के अवशेष, दीपक के अवशेष, काफी संख्या में लाल मृदभाण्ड, चमकीले काले एवं लाल रंग के मृदभाण्ड जिनमें कटोरे, थाली के टुकड़े, सुराही के अवशेष मिले।


डॉ. एसपी सिंह का कहना है कि ये मूर्तियाँ कुषाणकालीन हैं। उनकी प्राचीनता प्रथम शताब्दी ई. तक जती है। वहाँ पर मौजूद टीले, कुओं, सुरंग और चौड़ी दीवार से संकेत मिलता है कि वह कुषाण काल में विकसित क्षेत्र था। वहाँ पर सुनियोजित तरीके से खुदाई की आवश्यकता है। इससे एक नगरीय सभ्यता के साक्ष्य प्राप्त हो सकेंगे। वह अपनी रिपोर्ट पुरातत्व विभाग को भेज कर वहाँ उत्खनन का आग्रह करेंगे।


डॉ. सिंह की टीम ने मुकुन्दवार में सोने के सिक्के पाने की बहुत कोशिश की मगर मिले नहीं। दरअसल एक सप्ताह में जिन्हें भी सोने या चाँदी के सिक्के मिले उन्होंने उन्हें या तो छिपा लिया अथवा आसपास के स्वर्णकारों को बेच दिया। चर्चा है कि सोने के सिक्के 14 से 16 हजर रु में बिके हैं। स्वर्णकारों पर दबाव पड़ने पर वे सिक्के हासिल हो सकते हैं। आशंका है कि देर होने पर वे उन बहुमूल्य सिक्कों को गला डालेंगे और तब एक प्राचीन सभ्यता के प्रमाण नष्ट हो जाएँगे।


मुकुन्दवार गाँव एक सप्ताह पहले तब चर्चा में आया जब तालाब के किनारे केकड़ा खोजने गए कुछ बच्चों को वहाँ से सोने के कुछ सिक्के मिले। यह बात गाँव में ज्यों ही फैली बहुत से लोग कुदाल-खुरपी ले कर खुदाई के लिए निकल पड़े। खुदाई में एक सप्ताह में करीब 18 सिक्के मिलने की चर्चा है मगर गाँव का कोई व्यक्ति अब कबूल करने को तैयार नहीं कि उसके पास कोई सिक्का है।


‘हिन्दुस्तान’ ने उन सिक्कों के महत्व को देखते हुए सोमवार को गोरखपुर विश्वविद्यालय के प्राचीन इतिहास विभाग के अध्यक्ष प्रो सच्चिदानन्द श्रीवास्तव से सम्पर्क किया था। बताया था कि वहाँ जाने में देर होने पर एक प्राचीन सभ्यता के प्रमाण ग्रामीणों द्वारा नष्ट किए जाने की आशंका है। विषय के महत्व को देखते हुए प्रो श्रीवास्तव ने विभाग के डॉ. एसपी सिंह के नेतृत्व में डॉ. रामप्यारे मिश्रा और पूर्वी उत्तरप्रदेश में ताम्रपाषाणी संस्कृति पर शोध कर रहे अखिलेश चौबे को मंगलवार को मुकुन्दवार गाँव भेजा। डॉ. सिंह का कहना है कि यहाँ उपलब्ध प्रमाण बताते हैं कि उस काल के लोग लाल मिट्टी के बर्तनों का उपयोग करते थे। वहाँ दिख रही एक मीटर चौड़ी दीवार प्राचीन कुषाण काल की लग रही है। यहाँ की पूरी सम्पदा प्राचीन धरोहर है जिसकी हर हाल में रक्षा होनी चाहिए।

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  • Web Title:‘मुकुन्दवार’ में कुषाणकालीन सभ्यता के प्रमाण मिले