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मानवीय विकास ने कांग्रेस को जिताया

भारत में हाल के जनादेश की महिमा पर पूरी दुनिया को गौर करना चाहिए। पंद्रहवीं लोकसभा के चुनाव में वोट डालने योग्य दस में से छह मतदाताओं ने यह करिश्मा कर दिखाया है। उन्होंने एक से अधिक तरीकों से इतिहास रचा है। पिछले चार प्रधानमंत्रियों में मनमोहन सिंह ही ऐसे पहले प्रधानमंत्री हैं, जिन्होंने लगातार दूसरी बार देश की बागडोर संभाल कर इतिहास रचा है। 1989 में राजीव गांधी, 1996 में नरसिंह राव और 2004 में अटल बिहारी वाजपेयी जो करिश्मा नहीं कर पाए, उसमें मनमोहन सिंह कामयाब रहे।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उनकी कांग्रेस पार्टी ने अपने नए मुख्य प्रचारक राहुल गांधी के नेतृत्व में, जिन्होंने पार्टी में नया जोश भरा, 200 सीट की बाधा पार की। इससे यह मजबूत संकेत मिलता है कि नई सरकार में पार्टी और आम आदमी से जुड़े मुद्दों को प्राथमिकता दी जएगी। यह उन अन्य दलों के ठीक उलट है, जिनमें परिवार महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।

इसमें तमिलनाडु का द्रविड़ मुनेत्र कषगम (द्रमुक) प्रमुख रूप से शामिल है। यह भी बहुत महत्वपूर्ण है कि चुनाव में मुख्य रुप से कोई भावनात्मक और विभाजनकारी मुद्दा नहीं था। इसके बावजूद कांग्रेस ने यह जीत हासिल की। 1984 में जब इंदिरा गांधी की हत्या हुई थी तो भाजपा के वोट में सात प्रतिशत की गिरावट आई थी, क्योंकि उनके समर्थक कांग्रेस के पाले में चले गए थे।

इसी तरह कारगिल युद्ध के कारण 1999 के लोकसभा चुनाव में वाजपेयी को लाभ मिला था, क्योंकि तब युद्ध के संकट से घिरी राजग सरकार को जनता ने समर्थन दिया था। कांग्रेस के दृष्टिकोण से 2004 के लोकसभा चुनाव में उसकी जीत का मुख्य कारण सत्तारूढ़ एनडीए में गरीब-समर्थक संवेदनशीलता की कमी और ‘‘इंडिया शाइनिंग’’ नारे के प्रति जनता का असंतोष  था। वास्तव में उसने जो 146 सीटें जीतीं, उनमें से 63 राज्य स्तरीय गठबंधनों के कारण थीं। इस बार स्थिति अलग है।

इस बार न केवल सकारात्मक वोट पड़े हैं, बल्कि पार्टी ने कई राज्यों में अपने बलबूते पर बड़ी उपलब्धि भी हासिल की है। झरखंड में वह दूसरे स्थान पर है और बिहार में उसे दस प्रतिशत से ज्यादा वोट मिले हैं। उत्तर प्रदेश में उसे 21 सीटें मिली हैं, जिससे पता चलता है कि हिन्दी भाषी क्षेत्रों में वह फिर से पुनर्जीवित हुई है। हिन्दी पट्टी की 225 लोकसभा सीटों में से कांग्रेस 77 सीटें पाने में कामयाब रही है। यहां असली कहानी नंबरों में छुपी है।

दक्षिण में कांग्रेस ने 60 में से 32 सीटें जीतीं, जो छोटी संख्या भले ही हो, लेकिन सम्मानजनक स्थिति दर्शाती है। असल में, पार्टी ने कई चुनावों के बाद उन्नाव और फरूखाबाद की सीटें जीतकर उत्तर प्रदेश में उल्लेखनीय वापसी की है। 1998 के बाद बिहार में पहली बार बिना किसी गठबंधन के उसे दस में से एक वोट मिला है। हालांकि उत्तर भारत में उसे अभी लंबा सफर तय करना है, पर जो 21 सांसद जीते हैं, उससे वह बहुजन समाज पार्टी या भाजपा दोनों से अधिक बड़ी हो गई है।

पंद्रहवीं लोकसभा के चुनाव में कांग्रेस को 30 प्रतिशत से थोड़े कम वोट अवश्य मिले, फिर भी वह विरोधियों से काफी आगे निकल गई है। 1989 के बाद भाजपा का यह अब तक का सबसे खराब प्रदर्शन रहा। उसे कांग्रेस से 89 सीटें कम मिली हैं। हिन्दुत्व पार्टी यानी भाजपा को अपने अत्यंत खराब प्रदर्शन पर फिर से सावधानीपूर्वक विचार करने की जरूरत है। उसकी हार का कारण प्रचार में कमी नहीं, बल्कि वृहत्तर रणनीति की खामियां हैं। इससे साबित होता है कि शहरी भारत के महत्वपूर्ण हिस्से द्वारा उसका साथ छोड़ देने से पार्टी की पराजय हुई।

कम दर पर अनाज देने का भाजपा का वायदा मतदाताओं को लुभा नहीं पाया। कांग्रेस और उसके सहयोगी दल कल्याणकारी उपायों से मतदाताओं पर अधिक असर डाल पाए। किसानों के लिए कजर्माफी, गरीब ग्रामीणों के लिए रोजगार, सरकारी स्कूलों का विस्तार और आदिवासियों को वन अधिकार जसे कल्याणकारी उपायों के सामने विपक्ष के पास कोई ठोस मुद्दे नहीं रह गए थे। यह बात न केवल भाजपा, बल्कि राजनीति के दूसरे छोर वामपंथी दलों पर भी लागू होती है।

माक्र्सवादी पार्टी ने देखा कि भूमि अधिग्रहण की राजनीति और अल्पसंख्यकों का अविश्वास पश्चिम बंगाल में ममता और कांग्रेस के आगे आने के कारण बने। वाम मोर्चे को मुर्शीदाबाद  से लेकर डायमंड हार्बर तक के क्षेत्र में 24 लोकसभा सीटों में से सिर्फ दो पर जीत हासिल हुई। दलित, मुस्लिम और आदिवासी, जो वामदलों के सुदृढ़ आधार थे, साथ छोड़ गए। नंदीग्राम और सिंगुर की ताज कटु स्मृतियां उनके मन में थीं और वाममोर्चे की बरगा ऑपरेशन और पंचायती राज जसी पुरानी उपलब्धियां फीकी पड़ गईं।

लोकसभा के ताज चुनाव में कांग्रेस को बाजर और पूंजी आधारित आर्थिक सुधारों की बजय सामाजिक लोकतांत्रिक दृष्टिकोण अपनाने के कारण विजय मिली। भारत में उसका विशाल सामाजिक आधार है। समावेशित भारत (इनक्लुसिव इंडिया) में जो ताकत और अपील है, वह ‘‘शाइनिंग इंडिया’’ या ‘‘अतुल्य भारत’’ में नहीं हो सकती है। सुल्तानपुर में राहुल गांधी की यह टिप्पणी उचित थी : ये भारत के गरीब थे, जिन्होंने कांग्रेस को जिताया। इस विशाल वर्ग को पीछे छोड़कर देश और अर्थव्यवस्था को आगे नहीं ले जया ज सकता। इस मायने में 1971 और 2009 की जीत में समानताएं हैं।

उस समय मतभेद बड़े थे। कांग्रेस ने दो साल तक 221 सांसदों के साथ अल्पसंख्यक सरकार चलाई और डीएमके तथा सीपीआई के साथ मिलकर विपक्ष का भी सामना किया। जसा कि उस वक्त था, वसा ही अब भी है। कांग्रेस ने समाजवाद की बात किए बिना समाजवादी रवया अपनाया, जिसके सामने विपक्ष की नहीं चली और कांग्रेस को इसका लाभ मिला।

अब उसके सामने अधूरे कामों को पूरा करने की चुनौती है। यह तभी संभव है, जब वह गरीबों और किसानों के लिए कल्याणकारी एजेंडा लाए और स्वरोजगार को प्राथमिकता दे। अगर उसकी सरकार बाजर-आधारित सुधारों की दिशा में भागी तो दूसरे भारत की आशाएं-आकांक्षाएं पूरी नहीं कर पाएगी। आधुनिक सेक्टरों में जो विकास हुआ है, वह 1991 से देश को कई तरह की सेवाएं-फायदे प्रदान कर रहा है। लेकिन 1996 में राव सरकार और 2004 में वाजपेयी सरकार का जो सफाया हुआ, उसमें एक बात समान थी कि विकास में मानवीय दृष्टिकोण को नजरअंदाज किया गया था।

मानवीय दृष्टिकोण को महत्व देने के चलते ही संप्रग सरकार ने लोगों का दिल जीता। आगामी पांच वर्षो में गठबंधन के सहयोगी दलों का दबाव नहीं रहा तो कांग्रेस अपने ही सुधारकों और उदारवादियों को नियंत्रित कर अपनी शक्ित दूसरी तरफ लगा सकती है। अगर उन्हें छूट दे दी गई तो न केवल सामाजिक आधार, बल्कि राजनीतिक भविष्य भी खतरे में पड़ सकता है। ऐसा होने पर लोगों के विश्वास के साथ धोखा होगा। 
 
rangarajan. mahesh@ gmail. com

लेखक राजनीतिक टिप्पणीकार और दिल्ली विश्वविद्यालय में इतिहास के प्रवक्ता हैं

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