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नौकरशाही : महिलाओं के आने से उम्मीद

कुछ दिनों पहले केन्द्रीय सिविल सेवा परीक्षा के परिणाम जब घोषित हुए तब पूरा देश आश्चर्यचकित रह गया। सिविल सर्विस परीक्षा के इतिहास में पहली बार प्रथम तीन स्थानों पर लड़कियों ने वर्चस्व कायम किया। यही नहीं शुरू के 25 स्थानों में 10 स्थान लड़कियों को मिले। एक आश्चर्यजनक बात यह भी हुई कि हिन्दी के माध्यम से परीक्षा देकर कुछ लड़कियों ने उच्च स्थान प्राप्त किया है। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह हुई कि बड़े शहरों जसे दिल्ली, मुम्बई, कालेकाता और चेन्नई के बदले छोटे शहरों में रहने वाली लड़कियों ने इस परीक्षा में शानदार सफलता पाई है।

बरेली की रहने वाली सुभ्रा सक्सेना ने पहला स्थान हासिल किया है। दूसरे स्थान पर पंजब की सरणदीप कौर और तीसरे स्थान पर छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में रहने वाली किरण कौशल को मिला। एक महत्वपूर्ण बात यह हुई कि किरण कौशल ने हिन्दी के माध्यम से परीक्षा देकर तीसरा स्थान प्राप्त किया। जब उनसे उनकी सफलता केबारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि यह कोई आवश्यक नहीं कि अंग्रेजी के माध्यम से परीक्षा देने वालों को ही विशिष्ट स्थान मिले।

उनके मुताबिक अब हिन्दी में ऐसी पुस्तकें आ गई हैं और उच्च स्तर के ऐसे समाचारपत्र हैं जिन्हें पढ़ने से किसी भी राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय विषय का पूरा ज्ञान हो जता है। अत: हिन्दी के माध्यम से लिखने में भी कोई कठिनाई नहीं होती है।इस सिविल सर्विस परीक्षा के परिणाम ने कई मायने में लोगों की आंख खोल दी हैं।

एक तो यह कि लड़कियां परीक्षा के परिणाम में सर्वोच्च स्थान प्राप्त नहीं कर सकती हैं और दूसरा मध्यम वर्गीय परिवार से आने वाली लड़कियां भी साधनों के अभाव में रहने के बावजूद भी अपनी मेहनत और लगन से शानदार सफलता प्राप्त कर सकती हैं। निजी क्षेत्र के बड़े प्रतिष्ठानों में भी यह अनुभव से पाया गया है कि जहां लड़कियां मैनेजर के पद पर नियुक्त हैं वहां कर्मचारियों में कार्यकुशलता अधिक है। वहां अनुशासन बहुत ही अनुकरणीय रहता है। क्योंकि लड़कियों के सामने कोई भी कर्मचारी बदतमीजी करने का साहस नहीं करता है।

लड़कियों की इस शानदार सफलता ने अनायास ही कई प्रश्नों को जन्म दे दिया है। पिछले कई वर्षो से इस बात की चर्चा होती रही है कि भारत में नौकरशाही भ्रष्ट है। इसका अर्थ यह नहीं है कि सभी नौकरशाह भ्रष्ट हैं और ऊपरी कमाई करते हैं। परनतु इसमें कोई संदेह नहीं कि नौकरशाही के एक बहुत बड़े वर्ग में ऊपर से नीचे तक भट्राचार फैला हुआ है। जिन लोगों ने नौकरशाही में व्याप्त भ्रष्टाचार पर शोध किया है उनका कहना है कि यह एक ऐसा मकड़जल है जिससे कोई ईमानदार नौकरशाह निकलना भी चाहे तो नहीं निकल सकता है।

उसके दूसरे साथी उसे भ्रष्ट और बेईमान होने के लिए बाध्य कर देंगे। अपने जीवनकाल में स्वगीर्य राजीव गांधी ने कहा था कि विकास के लिए जितना पैसा केन्द्र से राज्यों को जता है उसमें एक रुपए में से केवल 15 पैसा आम जनता तक पहुंच पाता है। शेष 85 पैसे बिचौलिए मार जते हैं। हाल में राहुल गांधी ने एक प्रेस कांफ्रेंस में यह रहस्योद्घाटन किया कि अब स्थिति पहले से ज्यादा खराब है। क्योंकि अब केन्द्र द्वारा भेजे गए एक रुपए में से केवल 10 पैसा जनता तक पहुंच पाता है। यह एक अत्यंत ही गंभीर समस्या है। सरकारी अफसारों की मिलीभगत के बिना इस तरह की लूट संभव नहीं है। आम जनता तक सच्चई पहुंच ही नहीं पाती है। वह इस सत्य को नहीं समझ पाती है कि जिस पैसे की लूट हो रही है वह उसी का पैसा है, करदाताओं का पैसा है।

बिहार, झरखंड और उत्तर प्रदेश में एक कहावत मशहूर है कि विकास का धन लूट का धन है जिसे ईमानदारी से 4 वर्गो के लोग बांट लेते हैं। नौकरशाह, राजनेता, इंजीनियर और ठेकेदार। जनता को केवल झुनझुना प्राप्त होता है। समाज के ये चारों वर्गो के लोग फलफूल रहे हैं और जनता कराह रही है। सांसदों के ऐच्छिक कोष के बारे में भी प्राय: यह शिकयत सुनने में आ रही है कि राजनेता और नौकरशाहों ने मिलकर इसका बहुत बड़ा भाग उड़ा लिया। आम जनता ठगी की ठगी रह जती है। प्रश्न यह है कि इस स्थिति पर कैसे नियंत्रण पाया जए और कैसे आम जनता तक विकास का धन पहुंचे।

इस सिलसिले में सबसे अधिक आवश्यक यह है कि सरकारी अफसरों में यह भावना फैलाई जए कि उनके ईमानदार होने से शेष लोग अपने आप ईमानदार हो जएंगे और विकास के धन की लूट बहुत हद तक रुक जएगी। मीडिया को भी जगरूक होना होगा। अब तो छोटी-छोटी जगहों से भी समाचार-पत्र निकलते हैं जिन्होंने कम पढ़े-लिखे लोगों में भी जगरूकता पैदा की है।

इसमें हिन्दी और अन्य भाषायी समाचार-पत्रों का बहुत बड़ा योगदान है। इसके अतिरिक्त अनगिनत टीवी चैनल भी आ गए हैं, जो लोगों को धीरे-धीरे जगरूक बना रहे हैं। स्वयंसेवी संस्थाएं जिन्हें ‘एनजीओ’ कहते हैं, यदि अधिक सक्रिय हो जएं तो आम जनता को इस तरह की लूट-खसोट के बारे में बताकर उसे रोकने में बहुत हद तक मदद कर सकती हैं। उम्मीद है कि यदि अधिक से अधिक महिलाएं केन्द्रीय सिविल सेवा और प्रांतीय सिविल सेवा में उत्तीर्ण हों तो वे भ्रष्टाचार को कमजोर करेंगी और नौकरशाही को सुधार देंगी।

लेखक पूर्व सांसद और पूर्व राजदूत हैं

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