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28 फरवरी, 2020|8:59|IST

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मधुसूदन सरस्वती

महात्मा मधुसूदन सरस्वती, पुरी के नीलांचलनाथ जगन्नाथ के परम भक्त थे। उन्होंने वेदान्त चेतना को भक्ित के माधुर्य से अलंकृत किया। वेदान्त के माध्यम से उन्होंने भक्ित, ज्ञान, वराग्य और तप का समन्वय किया। मधुसूदन सरस्वती का कहना था- ‘भगवान विभु, नित्य, पूर्ण और बोध सुखात्मक हैं।’ उनकी दृष्टि में भगवान सम्पूर्ण सौन्दर्यमय, परम रसमय और नि:शेष चिन्मय हैं।

महात्मा मधुसूदन सरस्वती तुलसी, सूर आदि संतों के समकालीन थे और उन्होंने अपनी भक्ित एवं विचारों से बंग भूमि को Þाीकृष्ण की रसानुभूति का आस्वाद कराया। उनका जन्म एक धर्मनिष्ठ ब्राrाण परिवार में हुआ था। विद्याध्ययन में वह बचपन से ही रुचि लेते थे। न्यायशास्त्र का अध्ययन उन्होंने छोटी आयु में ही कर लिया था।

बीस वर्ष की आयु में उनका मन सांसारिक सुखों से हट गया और वह भगवत् भजन के उद्देश्य से काशी आ गए। कहते हैं मार्ग में मधुमती नदी के तट पर उन्होंने बड़ी Þाद्धा और निष्ठापूर्वक नदी का स्तवन किया। नदी ने प्रकट होकर उन्हें वर दिया। उनका नाम ‘कमल जनयन’ से मधुसूदन हो गया। काशी में मधुसूदन शास्त्रों का अध्ययन करने लगे। उन्हें विश्वेश्वर सरस्वती ने दीक्षा दी। संन्यास लेकर मधुसूदन सरस्वती ने सत्रह वर्ष तक कठोर तप किया। वह शास्त्रों के परम ज्ञाता थे। उन्होंने वेदान्त में निर्मल वराग्य और निष्काम भक्ित को मिलाया। निगरुण-सगुण भक्ितरस को एक किया।

मधुसूदन सरस्वती ज्ञान भक्त और रसिक संत थे। उन पर सरस्वती की विशेष कृपा थी, उन्होंने Þाीमद्भगवत गीता की टीका लिखी थी। उसमें भगवान विष्णु को स्मरण करते हुए उन्होंने कहा- ‘ध्यानाभ्यास से मन को वश में कर योगी जन यदि किसी परम निगरुण निष्क्रिय ज्योति को देखते हैं तो भले ही देखें। हमारे लिए तो यमुना तट पर जो अलौकिक नील ज्योति दौड़ती फिरती है, वही चिरकाल तक नेत्रों को चमत्कृत करती रहे।’ काशी में जब तुलसीदास ने उन्हें ‘रामचरित मानस’ की पाण्डुलिपि दिखाई तो उसे पढ़ कर उन्होंने लिखा- ‘इस काशी रूपी आनंदवन में तुलसीदास तुलसी के चलते-फिरते पौधा हैं। उनकी कविता रूपी मंजरी अत्यंत सुंदर है, जिस पर राम रूपी भ्रमर सदा मंडराया करता है।’

मधुसूदन सरस्वती की भक्ित Þाीकृष्ण पर केन्द्रित थी। उन्होंने लिखा है- ‘जिनके करकमल वंशी से विभूषित हैं, जिनकी नवीन मेघ की सी आभा है, जिनके पीत वस्त्र हैं, अरुण बिम्ब फल के समान अधरोष्ठ हैं, पूर्णचन्द्र के समान मुख है, तथा कमल के से नेत्र हैं, उन Þाीकृष्ण को छोड़कर अन्य किसी भी तत्व को मैं नहीं जनता।’ मधुसूदन सरस्वती का संत समाज में बड़ा आदर था।

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