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खेल और तमाशा

हालांकि इंडियन प्रीमीयर लीग (आईपीएी) का दूसरा संस्करण पहले संस्करण जितना सफल तो नहीं रहा हे, लेकिन खेल, मनोरंजन, व्यापार का यह मिश्रण टिकाऊ हो गया है। इतनी सफलता इसे अब भी मिल गई है कि साल में दो बार आईपीएल आयोजित करने का विचार आयोजकों ने पुख्ता कर लिया है, ऐसे में अच्छा हो कि आयोजक कुद वे सबक भी दोहरा लें जो उन्होंने दो आयोजनों में सीखे हैं।

ऐसा इसलिए कहना जरूरी है कि आयोजक शायद यह भूल जते हैं कि आईपीएल की धूम इसलिए है कि क्रिकेट भारत में एक बेहद लोकप्रिय खेल है, वह सिर्फ उनके आयोजकीय कौशल और वाणित्य बुद्धि की वजह से सफल नहीं है। इसलिए यह जरूरी है कि वे खेल का महत्व समङों, सिर्फ उससे जुड़े व्यापार का नहीं। आईपीएल के आयोजन में खेल और खिलाड़ियों का ज्यादा ख्याल रखा जए और उसके इंतजम और ढांचे में ज्यादा पेशेवर नजरिया हो, यह कोई बहुत बड़ी उम्मीद नहीं है।

टीमों की मिल्कियत, उनमें  खिलाड़ियों को लिए जने का तरीका और उनसे बरताव और सबसे ज्यादा आयोजन समिति और बीसीसीआई में सुधार अपेक्षित है। क्योंकि भले ही यह क्रिकेट का नया स्वरूप है लेकिन वह क्रिकेट के बुनियादी नियमों के आधार पर ही चलता है, यह दो आयोजनों से स्पष्ट हो गया है। टीम में अच्छा माहौल और तालमेल, अच्छा कप्तान और खेल का बुनियादी कौशल इस बीस ओवरों के खेल में भी सफलता के सूत्र हैं।

वरना शाहरुख खान की कोलकाता नाइट राइडर्स सबसे नीचे नहीं होती और उनतालीस साल के अनिल कुंबले के नेतृत्व में बंगलूर रॉयल चैलेंजर फाइनल में नहीं पहुंचती। कुंबले, गिलक्रिस्ट, हैडन, शेन वार्न जसे रिटायर्ड खिलाड़ी इस बार भी सफल रहे इसका अर्थ है कि अनुभव और कौशल उतना ही जरूरी है जितना युवा जोश और फिटनेस।

पिछली बार फिसड्डी डेक्कन चाजर्र इस बार विजेता बनी और एक और असफल टीम रॉयल चैलेंजर उपविजेता, यह बताता है कि जो लोग अनुभव से सबक सीखते हैं वे आगे जते हैं। अगर आयोजक यह याद रखें कि आखिरकार यह भी टेस्ट या एक दिवसीय क्रिकेट की तरह बुनियादी तौर पर गेंद और बल्ले के संदर्भ का खेल है, और ग्लैमर और पैसा वगैरा उसके बाद आता है, तो यह इस खेल के लिए अच्छा होगा।

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