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दंगे की जति

प्रेम और बराबरी का संदेश देने वाले धर्म के उपदेश को फैलाना  जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी है उसके साथ फैलने वाली कटुता और संकीर्णता की भावना को रोकना। वरना जितनी तेजी से अच्छी बातों का प्रसार होता है उतनी ही तेजी से बुरी बातों का आयात-निर्यात भी होता है। वैश्वीकरण के दौरान तेजी से एक दूसरे के करीब आई दुनिया में जति, धर्म और पंथ के झगड़ों का मैदान पूरी दुनिया बन चुकी है।

यह बात वियना के गुरद्वारे में डेरा सच खंड के धर्म गुरुओं पर हुए हमलों के बाद पंजब में भड़के दंगों से साबित हो गई है। आमतौर पर माना जता है जतिगत भेदभाव हिंदू समाज की विशेषता है और उससे बाहर होने या परदेश चले जने पर यह सब समाप्त हो जता है। लेकिन जतिवाद ऐसी संक्रामक प्रवृत्ति बन गई है कि हिंदू धर्म को छोड़ कर सिख, बौद्ध, मुस्लिम और ईसाई बने लोग भी इससे पीछा नहीं छुड़ा पाए और देश से बाहर जकर भी भारतीय मूल के लोग इससे मुक्त नहीं हुए।

यह बात सहज रूप से कल्पना में ही नहीं आती कि पंजाब के गुरद्वारों के दलित और गैर दलित झगड़े वियना तक पहुंच जाएंगे और फिर वहां के असर से पंजाब में आग लगाई जाएगी। सही है कि पंजाब में मजहबी सिख अपने को अभी  भी उपेक्षित पाते हैं और जाट सिखों से  भेदभाव की शिकायतें करते रहते हैं। इन शिकायतों को समाज सुधार के शांतिपूर्ण आदोलनों से दूर किया जा सकता है और सिख धर्म उसी शानदार परंपरा की एक मिसाल है। इसलिए किसी विवाद को निपटाने के लिए न तो वियना में हमला करना उचित है न ही उसके जवाब में पंजाब में उग्र प्रतिक्रिया करना।

पंजब के प्रवासी आज पूरी दुनिया में फैले हैं और उसी के साथ फैला है उनका धार्मिक रीति-रिवाज। लेकिन बाहर बसने के बावजूद उन्होंने पंजब से अपने संबंध बनाए रखे हैं। अगर उनके इस रिश्ते से पंजब की आर्थिक ताकत बनती है तो इससे प्रवासियों की सांस्कृतिक अस्मिता कायम रहती है। दंगे और टकराव इस रिश्ते के बॉयप्रोडक्ट हैं। आज जरूरत इस बात की है कि पंजब के प्रवासियों के तमाम संगठन इस बॉयप्रोडक्ट को रोकें। लेकिन उससे भी बड़ी जरूरत इस बात की है कि पंजब सरकार और वहां के तमाम सामाजिक, राजनीतिक संगठन मिल कर पंजब में फैलती इस कटुता को शांत करें। पंजब बहुत दिनों बाद अमन और तरक्की की राह पर आया है और उसे फिर हिंसा और टकराव के रास्ते पर ढकेलना न तो पंजब के लोग चाहेंगे न ही वहां के प्रवासी।

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