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अस्मिता के बाद चाहिए नई राजनीति

प्रसिद्ध इतिहासकार एरिक हॉब्सवॉम ने एक बार पूछा था- अस्मिता तो ठीक है, पर अस्मिता के बाद क्या? शायद यही प्रश्न उत्तर प्रदेश का दलित बहुमत आज नहीं तो कल मायावती से पूछेगा। दलित अगर यह प्रश्न पूछने लगे तो मायावती को भी दलित राजनीति के लिए नये एजेन्डे पर विचार करना होगा। इस बार चुनाव पूर्व उत्तर प्रदेश के गाँवों में घूमते हुए अनेक के जबान पर यह सवाल एक चुप्पी और उदासी के रूप में दिखाई दिया। या फिर सहाबपुर के दलित युवक सुरेन्द्र जैसे लोगों के जुबान पर एक संकेत के रूप में मौजूद था। सुरेन्द्र कह रहे थे कि सच पूछिए तो हमें मायावती तो क्या, किसी को वोट देने का मन नहीं कर रहा है। इस वक्तव्य में मायावती से हो रहे मोहभंग की तरफ ही शायद कोई इशारा था, जिसे हम उस समय समझ नहीं पाए थे।

मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों में दलित अस्मिता की राजनीति के फलने-फूलने का वक्त हैं अभी, पर उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में जहाँ दलित राजनीति को सशक्त हुए लगभग 15 साल हो गए, ‘अस्मिता के बाद क्या’ का प्रश्न ही शायद गाँवों में दलित मतों को बड़े पैमाने पर निकल कर वोट देने का उनके पहले के उत्साह कम कर रहा था। चुनाव के दिन बसपा के तमाम संगठनात्मक प्रयासों के बावजूद वोटरों का कम निकलना दलित मतदाताओं में बढ़ रही निराशा का ही परिणाम हो सकता है।

आज बसपा के सामने दूसरे प्रकार की चुनौतियां भी खड़ी हो गई हैं। वह चुनौती ‘बहुजन से सर्वजन’ राजनीति की ओर उसके प्रयाण से जुड़ी है। ‘बहुजन’ से ‘सर्वजन’ की राजनीति एक ओर बहुजन अस्मिता बोध को डायलूट करती है, दूसरी तरफ ‘बहुजन को सच में’ ‘सर्वजन’ जैसा विकास, सुख और जीवन स्तर नहीं दे पाती। ‘बहुजन’(दलित) ‘सर्वजन’ (अदर) के बीच एक खाई दिखाई पड़ती है। यहां बहुजन एक ऐसा दलित समुदाय के रूप में उपस्थिति है, जो सर्वजन तभी हो पायेगी, जब सर्वजन जैसा जीवन स्तर उसे मिले। यह सच है कि आज बहुजन के मन में सर्वजन से जुड़ने की चाह पैदा हुई है। पर यह चाह मात्र राजनीतिक गठजोड़, वोट देने मात्र से ज्यादा सर्वजन जैसे जीवन स्तर की प्राप्ति से भी जुड़ी है। वस्तुत: ‘बहुजन’ राजनीति ने दलितों के बीच अच्छे जीवन, सुख सुविधा, की चाह तो पैदा की ही है, साथ ही उनमें सत्ता के विभिन्न तहों से जुड़ कर शक्ित और धन की प्राप्ति की गहन आकांक्षा भी पैदा की है। बाजार, सूचना, संसाधन इत्यादि से जुड़कर दलित एक ‘उपभोक्ता संवर्ग’ में भी तब्दील हुए हैं। बेहतर जीवन की उनकी चाह उन्हें विकास की आकांक्षा से भी जोड़ती है। इस प्रकार एक ओर बसपा के बहुजन से सर्वजन ऐजेन्डे से दलित अस्मिता डायलूट हुई, जो अब तक उनके आबद्धीकरण को अत्यंत सशक्त और आक्रामक बनाए हुए थी। तो दूसरी ओर नयी आकांक्षाओं से जुड़ने से दलितों में पैदा हुई बेहतर जीवन की चाह ने उन्हें दलितों की अस्मितापरक राजनीति के बारे में शक, कंफ्यूजन और प्रश्न पैदा किए।

बहुजन से सर्वजन के निर्माण में सर्वजन का भी बड़े पैमाने पर दलितों के साथ जुड़ना अभी बाकी है। बसपा द्वारा कान्ट्रैक्टर, व्यापारी तथा धनबली ब्राह्मणों को टिकट देने से आम ब्राह्मण  कितना बसपा की राजनीति से जुड़ पाया होगा, यह सोचने का विषय है। इस प्रकार इस चुनाव में दलितों में बहुजन चेतना कमजोर होती हुई, डायलूट होती हुई और पैसिव होती हुई दिखाई पड़ी। वही बहुजन का सर्वजन में विस्तार अभी बाकी है। इसके लिए आधार तल पर ईमानदार प्रयास और नई रणनीति की जरूरत के बारे में मायावती को सोचना ही होगा।

बसपा के एक ही साथ अस्मिता और अस्मिता के परे (बियोन्ड) जाने के प्रयास से उभरे दलित जनों में कंफ्यूजन को मायावती को दूर (या उसका समाधान) करना होगा। राजनीतिक व्यवहार का यही पैटर्न भाजपा के सन्दर्भ में भी देखा जा सकता है। साम्प्रदायिक अस्मिता, का इस्तेमाल और साम्प्रदायिक अस्मिता से उबरने की एक ही साथ किये जाने वाले प्रयासों से जो अन्तर्विरोध उभरता है, उसी अन्तर्विरोध ने इस बार भाजपा के मतदाताओं में भी भ्रम पैदा किया।

बसपा और दलित जनों के इस चुनाव में दिखे राजनीतिक व्यवहार के अध्ययन से जो निष्कर्ष निकलता है, वह है- अस्मिता की राजनीति और अस्मिता के परे (बियोन्ड) जाने के एक ही साथ किये जाने वाले प्रयासों से पैदा हुए अन्तर्विरोधों का शमन दलित जनचेतना के स्तर पर करने की जरूरत। इस चुनाव में उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की सफलता ने मायावती के लिए दोहरी चुनौती खड़ी कर दी है। पहली, ब्राह्मणों में कांग्रेस के इस पुन: उभार (रिवाईवल) को देखकर उसकी तरफ शिफ्ट करने के आकर्षण को तोड़ना। दूसरी, दलितों में कांग्रेस के प्रति अपने पुराने लगावों और सम्बन्धों के जागरण को नियंत्रित कर अपने साथ जोड़े रखना। दलित जन में जो सुख की चाह बढ़ी है, उसके कारण कांग्रेस की विकासपरक वादों और आर्थिक राजनीति की रणनीति का दलितों में प्रभाव बढ़ने की संभावना का काट ढूंढना भी मायावती के लिए एक बड़ी समस्या बनकर उभरी है। राहुल गाँधी की सर्वसुलभता, दलित जन के करीब जाने से बन रही प्रतीकात्मक भाषा में मायावती की दलित जनों से दूरी और अनुपलब्धता से पैदा हो रही दूरी के विपरीत दलितों में भी लोकप्रियता के नये मानक विकसित किए हैं। व्यक्ितत्व के स्तर पर मायावती को दलितों को अपने जातीय सम्बन्ध और अतीत के दमन से पैदा हुई स्वाभाविक भावनात्मक एकता के कारण हमेशा ‘टेकेन फॉर ग्रान्टेड’ न लेकर भावनात्मक रूप से भी उनके पास आना होगा। ‘अपने लोग’ अपने लोग हैं, ऐसा सार्वजनिक व्यवहार में जाहिर करना होगा।

बसपा की बहुजन अस्मिता जहां सामूहिक दलित जीवन में दमनकारी अतीत पर आधारित भावनात्मक तंतु विकसित करता रहा है, वहीं राहुल गाँधी, सोनिया गाँधी द्वारा (अमेठी-रायबरेली मॉडल में) अपने मतदाताओं से भावनात्मक सम्बन्ध बनाने की जो नयी राजनीति विकसित की गई है, उसका जबाब भी मायावती को ढूंढना होगा। प्रतीकों की राजनीति में मायावती और कांशीराम माहिर रहे हैं। अब उसमें व्यक्तिगत सम्बंधों, व्यक्तिगत  रिश्तों, अतीत से ज्यादा वर्तमान को सृजित करने का नया अर्थ भरना होगा। राहुल गाँधी के व्यक्तित्व, उनकी प्रतीकों की राजनीति और विकास आधारित आर्थिक राजनीति से सृजित नये अथरें ने बसपा एवं मायावती को उत्तर प्रदेश में दलित के लिए नयी राजनीतिक भाषा के इजाद करने की नई चुनौतियाँ खड़ी कर दी है।

लेखक गोविन्द बल्लभ पन्त सामाजिक विज्ञान संस्थान, इलाहाबाद में फेलो हैं

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