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उर्दू मीडिया : तीसरे मोर्चे की बाकी जगह

लोकसभा के नतीजों से तीसरा मोर्चा जिस तरह पाश-पाश हुआ था, उसकी बुनियाद पर यह नतीज निकालना सही नहीं होगा कि देश दो पार्टी व्यवस्था की तरफ बढ़ रहा है और तीसरे मोर्चे के लिए अब कोई जगह बाकी नहीं रह गई है।

सच तो यह है कि तीसरे मोर्चा के लिए जगह न केवल इसलिए मौजूद है कि जनता ने क्षेत्रीय पार्टियों को पूरी तरह निरस्त नहीं किया है, बल्कि इसलिए मौजूद है कि दोनों राष्ट्रीय पार्टियों के बीच नीतियों और कार्यक्रमों के स्तर पर कोई बहुत ज्यादा फर्क बाकी नहीं रह गया है। वरिष्ठ टिप्पणीकार महफुर्रहमान ने राष्ट्रीय सहारा के अपने स्तंभ ‘कभी कभी यूं भी होता है’ में आगे लिखा है कि दोनों खुले बाजर की अर्थव्यवस्था का समर्थन करती हैं।

विदेशनीति भी दोनों की लगभग एक जसी रही है। दोनों अमेरिका समर्थक हैं। इजराइल से दोनों को सामान्य तौर पर मोहब्बत है। फासीवाद और धर्मनिरपेक्षता के हवाले से दोनों पार्टियों के बीच जो फर्क दिखाई देता है, उसकी हैसियत भी हाथी के दिखाने वाले दांत जसी ही है। कहने वाले तो यह भी कहते हैं और शायद कुछ गलत नहीं कहते कि एक कट्टर हिन्दुत्व से प्रेरणा लेती है तो दूसरी ने नरम हिंदुत्व को अपना रहनुमा बना रखा है। जहां तक मुसलमानों का मामला है। उन्हें दुख है कि 15वीं लोकसभा में उनका प्रतिनिधित्व घटा है।

‘नई सरकार, नई चुनौतियां’ के शीर्षक से हिन्दुस्तान एक्सप्रेस ने अपने सम्पादकीय में लिखा है कि जरा सी कामयाबी के बाद कांग्रेस अपनी समर्थक पार्टियों के साथ जो रवया अख्तियार कर रही है, गठबंधन राजनीति के इस काल में वह शुभ संकेत नहीं है। इसे यह नहीं भूलना चाहिए कि अब भी इसकी अपनी सीटें केवल 202 हैं। इसको समर्थन देने वाली यह वह राजनैतिक पार्टियां हैं, जो पूर्व में राजग का भाग रह चुकी हैं। वह चाहे फारुक अब्दुल्ला, करुणानिधि या ममता बनर्जी ही क्यों न हों।

कांग्रेस को यह भी नहीं भूलना चाहिए कि अब भी देश के किसी भाग में सोनिया गांधी या राहुल बाबा की लहर नहीं चल रही है, जो वोट उसको मिले हैं, इसके पीछे कई कारण हैं। यह कांग्रेस से मोहब्बत या मनमोहन सरकार की नीतियों के समर्थन से ज्यादा मोदी और आडवाणी का भय था, जिसने मतदाताओं के एक वर्ग को इसकी ओर झुकने पर मजबूर कर दिया।

यूपी के बारे में बड़े ही जोर-शोर से यह कहा ज रहा है कि राहुल ने कांग्रेस के मुर्दा जिस्म में नई जन डाल दी है, लेकिन क्या यह सच नहीं है कि अगर मायावती के बारे में सेकुलर मतदाताओं को यह संदेह न होता कि वह भाजपा से हाथ मिला सकती है और समाजवादी पार्टी ने कल्याण सिंह से हाथ मिला लेने की गलती न की होती तो स्थिति भिन्न होती।

हमारा समाज के अपने स्तंभ में मौलाना अब्दुल हमीद नोमानी ‘पद को संकल्प और प्रतिज्ञा’ बताते हुए नेतृत्व के लिए नए खून की आवश्यकता बताई है। उन्होंने मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के कोलकाता अधिवेशन के संदर्भ में युवाओं और सक्रिय नेतृत्व की बात करते हुए राजनीति, समाज और शिक्षण संस्थानों की ओर संकेत कर चिह्न्ति किया है कि विश्व के तेजी से बदलते परिदृश्य में काम करने वालों और प्रभावी युवा पीढ़ी को भी सामने लाना चाहिए। स्तंभकार ने जहां शिवसेना, भाजपा, अकाली दल और वाम मोर्चा की हार के कारणों में से एक कारण यह भी लिखा है कि वह कोई आकर्षित नया चेहरा सामने नहीं ला सके। वरुण गांधी की शक्ल में जो चेहरा सामने लाने का प्रयास किया गया, वह डरावना और भयभीत करने वाला है। अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा, जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला और राहुल गांधी का हवाला देते हुए उन्होंने मुस्लिम समाज को भी आईना दिखाया है। उन्होंने लिखा है कि मुस्लिम समाज में नए नेतृत्व की गति सबसे अधिक धीमी है।

जमाअत इस्लामी हिंद के मुखपत्र ‘सहरोज दावत’ ने ‘नई केन्द्रीय सरकार को जनता की आशाओं पर पूरा उतरना चाहिए’ के शीर्षक से लिखा है कि आम चुनाव के नतीजों ने एक बार फिर लोगों को आश्चर्य में डाल दिया है, ऐसे परिणामों की उम्मीद नहीं थी। कांग्रेस को हिंदी भाषी क्षेत्र में काफी लाभ हुआ है।

अखबार आगे लिखता है कि भाजपा ने आम चुनाव में नरेन्द्र मोदी को भरपूर तरीके से इस्तेमाल किया, लेकिन उसकी चाल और चुनावी घोषणा-पत्र के लुभावने वादे मतदाताओं को अपनी ओर आकर्षित नहीं कर सके। अखबार लिखता है कि भाजपा एक स्वतंत्र और अपना अस्तित्व रखने वाली पार्टी नहीं है, यह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का केवल राजनैतिक धड़ा है।

लेखक स्वतंत्र पत्रकार है

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