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आज्ञा चक्र

हमारे शरीर में 9 चक्र हैं, जिनमें से एक है आज्ञा चक्र। इसका स्थान दोनों भवों के बीच कपाल के अंदर माना गया है। इसी स्थान पर पुरुष वर्ग तिलक और स्त्री वर्ग बिंदिया लगाती है। इसका रहस्य जरा गहरा है। योग शास्त्र में दिए गए विवरण के अनुसार कपाल के अंदर भ्रू-मध्य में दो मांस ग्रंथियां होती हैं, जिनमें से एक णात्मक (नेगेटिव) और दूसरी घनात्मक (पाजिटिव) विद्युतयुक्त होने से, पारस्परिक संघर्ष होने पर, प्रकाश उत्पन्न करती है। जब हम आंखें बंद कर ध्यान लगाते हैं या कोई गहरा सोच-विचार करते हैं तब यह प्रकाश उत्पन्न होता है। यदि हम बंद आंखों से भ्रू-मध्य में ध्यान से देखें तो हमें प्रकाश ङिालमिलाता दिखाई देगा। यहां महत्तत्व का वास होता है, यानी जीवात्मा। एकाग्रचित हो सुदृढ़ संकल्प से सतत अभ्यास करके प्रकाश को टार्च के प्रकाश की तरह केन्द्रित करके हम उस स्थान का दर्शन कर सकते हैं, जहां तक यह प्रकाश फेंक सकें।

यही दिव्य दृष्टि है जसा कि योग शास्त्र ने कहा है- मूर्धज्योतिषि सिद्धदर्शनम् (योग 3-32)। ध्यान जब एकाग्र और बलवान होता है, तब स्थूल शरीर की सीमा और बाधा से परे हो जता है। तब हमारे इस आज्ञा चक्र के प्रकाश द्वारा दूर-दूर तक गति करके वहां का दर्शन किया ज सकता है। अभ्यास द्वारा इस शक्ति को प्राप्त कर आज्ञा चक्र से निकली आज्ञा इतनी बलवान हो सकती है कि अन्य कोई इसका उल्लंघन नहीं कर सकता।

हमारे शरीर में व्याप्त आत्मा का विस्तार यूं तो हमारे शरीर तक ही सीमित रहता है, पर ज्ञान की शक्ति व सहायता से हम आत्मा का विस्तार बढ़ा सकते हैं, जसे मोह-माया के प्रभाव से हम दूसरी आत्माओं से जुड़ जते हैं। मां अपनी गोद में दूध पीते बच्चे से जुड़ी होती है। हम जिन-जिन आत्माओं से भावनात्मक रूप से जुड़े होते हैं, जिनके प्रति अपनत्व का भाव रखते हैं, उनके सुख-दुख हमें, अपने सुख-दुख मालूम देते हैं। यह हमारी आत्मा का उन आत्माओं तक विस्तार होना ही है। आज्ञा चक्र द्वारा हम अपने ज्ञान का विस्तार कर सकते हैं यानी अपना अज्ञान दूर कर सकते हैं।

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