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हम तो आंदोलन करेंगे!

वेतन की कमी के विरोध में एमटीएनएल के बी ग्रेड अधिकारियों के असहयोग आंदोलन से दूरसंचार सेवाएं प्रभावित रही। इससे जनता को एमटीएनएल की सेवाओं से कोई ज्यादा फर्क नहीं पड़ा, क्योंकि अधिकांश दिल्ली की जनता मोबाइल पर मेहरबान है। दिक्कत हुई तो एमटीएनएल इंटरनेट सेवा से बैंकिंग सेवा को। कोई एमटीएनएल अफसर "राम खिलावन" की समस्या का समाधान कर सकता है जो बैंक कर्मचारियों के सामने गिड़गिड़ाता है "बाबू जी! शाम को दरभंगा की गाड़ी का रिजव्रेशन है बिना धन के हम कैसे ट्रेन पकड़ेंगे।" इसका जवाब न तो टेलिफोन अधिकारियों के पास है और न ही बैंककर्मियों के पास। बस, किसी तरह से मांगें मंजूर हो जएं। पगार बढ़ जए। जनता जए भाड़ में।
                
कुमार सिंह, रोहिणी, दिल्ली

बिहार नहीं तो विकास नहीं

पंद्रहवीं लोकसभा के गठन में बिहारी मंत्रियों की संख्या नगण्य रहेगी तो शायद ही बिहार को विशेष राज्य का दज्र मिले। फिर भी राज्यवासियों को केन्द्र व जदयू, भाजपा के सांसदों से आशा है कि वे बिहार को विशेष राज्य का दज्र दिलाएंगे। केन्द्र अपनी बात पर अडिग रहे, क्योंकि केन्द्र सरकार भली भांति जनती है कि मजदूरों ही नहीं, पढ़े-लिखे युवा भी बिहार से अन्य राज्यों को पलायन करते हैं। बिहार से विजयी हर पार्टी के प्रतिनिधियों से आग्रह है कि बिहार के लिए कुछ करें। पुन: विजयी होने पर नाम ही काफी होगा।

अमित बजरंग, नई दिल्ली

सरकारी स्कूलों से भेदभाव

सरकारी स्कूलों की जजर्र इमारतों और पठन-पाठन की सामग्री तथा शिक्षकों के अभाव के कारण ही पिछले कुछ सालों में पब्लिक स्कूलों की बाढ़ आई। इसके चलते प्राथमिक शिक्षा का पूरी तरह प्राइवेटाइजेशन हो गया। आज मुंहमांगी फीस के रूप में अभिभावक अपनी आय का एक बड़ा हिस्सा चुका रहे हैं, पर यही अभिभावक उस छोटी सी राशी देने में भी आनाकानी करते हैं, जो सरकारी स्कूलों में बच्चों के मानसिक विकास के लिए ली जती है। परीक्षा परिणामों की बात करें तो होनहार विद्यार्थी तो सरकारी शिक्षा संस्थानों में भी हैं। कभी-कभी तो अभिभावक स्कूल पर पैसे खाने का इल्जम तक मढ़ देते हैं।

शरद कुमार सिंह, गोविन्दपुरी, नई दिल्ली

पानी की चाह में बहाता खून

पानी जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं में से एक है। देश ने चाहे जितनी उन्नति कर ली हो, पर स्वच्छ पेयजल उपलब्ध नहीं है। पिछले दिनों देश की राजधानी और महानगर के किनारे पर स्थित एक शहर में पानी के लिए तलवारें चल गईं। इस समस्या की ओर समय रहते ध्यान देना आवश्यक है।

सुरेन्द्र कुमार, नजफगढ़, दिल्ली

भाजपा का "भय हो"

लोकसभा चुनाव परिणामों से जो जनादेश सामने आया है, उससे ऐसा लगता है कि भाजपा का ‘भय हो’ प्रचार गीत उलटा पड़ गया। तभी तो जनता ने भयभीत होकर इन्हें ही नकार दिया।

दिलीप लोढ़ा, रायपुर, छत्तीसगढ़

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