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पाल के माधव

नेपाल के सामने इस समय जितनी चुनौतियां हैं, उनका मुकाबला वहां के नए प्रधानमंत्री माधव कुमार नेपाल कुशलता पूर्वक कर पाएंगे, यह दावे के साथ कहा नहीं जा सकता। पर एक बात जरूर विश्वास के साथ कही ज सकती है कि नेपाल को मौजूदा संकट से वही नेता निकाल सकता है जो देश के परस्पर विरोधी राजनीतिक दलों के बीच एक तरह की सर्वानुमति बनाए और चीन के भड़कावे में आकर भारत के प्रति पूर्वाग्रह न पाले। हालांकि देश की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी और हाल में सत्ता से बाहर हुई यूसीपीएन-माओवादी ने अपना उम्मीदवार न खड़ा कर माधव नेपाल के प्रधानमंत्री बनने में कोई अडंगा नहीं लगाया है पर दूसरी तरफ देश में जिस प्रकार विस्फोट हुए हैं, उससे वहां हिंसा की आशंका से इनकार नहीं किया ज सकता।

माधव नेपाल और पुष्प कमल दहाल प्रचंड दोनों कम्युनिस्ट विचारधारा से ही संबंध रखते हैं, पर माधव प्रचंड के मुकाबले ज्यादा उदार और लोकतांत्रिक माने जते हैं और उनके सिर पर पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के सशत्र विद्रोहियों का उतना दबाव भी नहीं है, जितना प्रचंड के साथ था। वे भी राजशाही के विरोध में संघर्ष कर सत्ता में आए थे और उन्हें भी शासन करने का अनुभव प्राप्त है। यह बात अलग है कि उनकी पार्टी जनता की नजर में उतनी प्रखर और क्रांतिकारी नहीं है, जितनी प्रचंड की माओवादी। पर एमाले की छवि नेपाली कांग्रेस से बेहतर है और शायद इसीलिए उनके नेतृत्व में संविधान के निर्माण करने और शांति समझोते को लागू करने का विश्वास बनाया ज रहा है। आज नेपाल में सबसे बड़ा संकट विश्वास का है।

यह ठीक है कि एमाले को नेपाली कांग्रेस, तराई-मधेशिया लोकतांत्रिक पार्टी, मधेशिया जनाधिकार मंच और नेपाल सद्भावना पार्टी का समर्थन मिल रहा है, लेकिन उसके लिए सबसे बड़ी चुनौती माओवादियों का विश्वास भी जीतना है। आज वहां संयुक्त राष्ट्र का मिशन और उसकी निगरानी में हुआ समझोता नाकाम हो गया है। दूसरी तरफ अगर संविधान का निर्माण आमराय से नहीं होता है तो देश को राजनीतिक स्थिरता और प्रगति के रास्ते पर लाना मुश्किल होगा। इस विवाद में एक महत्वपूर्ण पेंच भारत का भी है। प्रचंड दावा कर रहे हैं कि भारत ने सेनाध्यक्ष कटवाल की तरफ से हस्तक्षेप कर उनकी सरकार गिरवा दी है। इसलिए इस समय माधव नेपाल की एक बड़ी भूमिका भारत के बारे में बढ़ती इस गलतफहमी को दूर करने की भी बनती है।

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  • Web Title:पाल के माधव