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छोटे शहर अब कहां रहे छोटे

छोटे शहर अब कहां रहे छोटे

फैशन, स्टाइल, पहनावा और सजने-धजने में छोटे शहरों की युवतियों ने दिल्ली-मुंबई जैसे मेट्रोज की लड़कियों को भी पीछे छोड़ दिया है। चंडीगढ़ तो खैर पहले से ही एडवांस था, लेकिन जयपुर, पटना, रांची, लखनऊ, इलाहाबाद, देहरादून, भोपाल आदि पर नजर डालें, तो ऐसा लगता है कि वहां जैसे ब्यूटी रिवॉल्यूशन हो गया हो। लेजर क्लीनिक, बड़ी ब्यूटी व फिटनेस कंपनियां आदि जो कभी सिर्फ बड़े शहरों में थीं, आज दूसरी और तीसरी Þोणी के शहरों में भी इनकी भरमार है। और ब्यूटी पार्लरों की तो बात ही छोड़ दीजिए.. ये तो कस्बों में भी बड़ी संख्या में हैं। अब तो यूपी के गाजीपुर जिले के करीमुद्दीनपुर गांव तक में इन्होंने पैठ बना ली है। क्या इसकी एक बड़ी वजह यह है कि उदारीकरण के बाद छोटे शहरों में भी नौकरियां काफी संख्या में पहुंची हैं।

रांची के जीतेंद्र सिंह एक दिन अचानक, अपनी बेटी आकांक्षा के दफ्तर पहुंच गए। दरअसल, वह काफी देर से आकांक्षा का मोबाइल फोन ट्राई कर रहे थे, लेकिन वह लगातार नॉट रीचेबल आ रहा था। उन्होंने फोन कर आकांक्षा के दोस्तों से भी उसके बारे में पूछा, लेकिन किसी के पास कोई क्लू नहीं था। सिंह साहब घबरा गए और आनन-फानन में ऑटो रिक्शा लेकर आकांक्षा के दफ्तर चल पड़े। आकांक्षा सही-सलामत थी। हुआ यह था कि वह घर से निकलने से पहले अपना मोबाइल फोन चार्ज करना भूल गई थी और उनके फोन का चार्जर भी घर में ही छूट गया था। ऑफिस पहुंचने के थोड़ी देर बाद ही उसके फोन की बैटरी पूरी तरह डिस्चार्ज हो गई और फोन बंद हो गया। जीतेंद्र सिंह आकांक्षा के दफ्तर तो पहुंच गए, लेकिन वहां आकांक्षा को देख कर वह एक नजर में उसे पहचान ही नहीं पाए। सीधी-सादी सी उनकी बेटी वहां एकदम अल्ट्रा मॉडर्न लग रही थी। दरअसल, ऑफिस के बाद आकांक्षा को किसी दोस्त की बर्थडे पार्टी में जाना था और इसीलिए, वह ब्यूटी पार्लर से होकर ऑफिस आई थी। ब्यूटी पार्लर में आई लाइनर, लिप लाइनर, लिपस्टिक, काजल, ब्लशर आदि का जबरदस्त तरीके से इस्तेमाल किया गया था और इन चीजों ने मिलकर आकांक्षा को एक मॉडल-सा लुक दे दिया था।
यह  कोई अकेला वाकया नहीं है। सच तो यह है कि अब तो फैशन, स्टाइल, पहनावा और सजने-धजने में छोटे शहरों की युवतियों ने दिल्ली-मुंबई जैसे महानगरों की महिलाओं को भी पीछे छोड़ दिया है।
अगर जयपुर, पटना, रांची, लखनऊ, इलाहाबाद, शिमला, देहरादून, भोपाल, आदि शहरों पर नजर डालें, तो ऐसा लगता है कि वहां जैसे ब्यूटी रिवॉल्यूशन हो गया हो। कई युवतियां ऐसी हैं, जो घर में चाहे कितनी ही सिंपल क्यों न रहती हों, लेकिन बाहर निकलते ही उनमें जबरदस्त बदलाव नजर आ रहा है। इसके अलावा, अब छोटे शहरों में भी बड़ी संख्या में ऐसे लोग देखने को मिलते हैं, जो महिलाओं के फैशन, स्टाइल व सजने-संवरने आदि को सहज रूप में ले रहे हैं।

मूलत: पटना की रहने वाली, दिल्ली यूनिवर्सिटी की स्टूडेंट निशा मिÞा कहती हैं- ‘हमारे पेरेंट्स आधुनिक विचारों वाले हैं और इन चीजों पर कभी नाक-भौं नहीं सिकोड़ते। अब छोटे शहरों में भी माहौल काफी बदल गया है।’ वैसे, निशा ने यह भी स्वीकारा कि पुराने खयालों के लोग महिलाओं के अल्ट्रा मॉडर्न होने को पचा नहीं पा रहे हैं और इसी का नतीजा है कि लड़कियां छिप कर अपने पसंद का काम करती और सजती-संवरती हैं।
वह समय काफी पीछे छूट गया है, जब लेजर क्िलनिक, बड़ी ब्यूटी व फिटनेस कंपनियां आदि सिर्फ बड़े शहरों में दिखते थे। आज की तारीख में दूसरी और तीसरी Þोणी के शहरों में भी ऐसे क्लीनिकों व कंपनियों की भरमार नजर आ रही है। और ब्यूटी पार्लर की तो बात ही छोड़ दीजिए! ये तो कस्बों में भी बड़ी संख्या में खुल गए हैं।
छोटे शहरों में फैशन की दुनिया इस कदर बदल चुकी है कि वहां नामी फैशन डिजायनरों ने भी अपने आउटलेट्स खोल लिए हैं। इसके अलावा, हेयर ग्रोथ क्िलनिक भी आपको वहां मिल जाएंगे।
लेकिन यह सब हुआ कैसे?
इतना बड़ा चेंज छोटे शहरों के लाइफ स्टाइल में कैसे आया? महिलाओं की जीवनशैली पर रिसर्च कर रहीं रश्मि देव का कहना है- इसका एक कारण तो यह है कि उदारीकरण के बाद छोटे शहरों में भी नौकरियां काफी संख्या में पहुंची हैं। ऐसे में, वहां की महिलाओं के पास भी पैसे आ रहे हैं। दूसरी बात यह कि यदि महिलाएं काम करने ऑफिस जाएंगी, तो वहां के माहौल के अनुरूप उन्हें खुद को ढालना पड़ेगा। एक वजह टेलीविजन भी हो सकता है। टेलीविजन पर आने वाले सीरियल महिलाओं को काफी पसंद आते हैं और वहां, किसी भी महिला पात्र को शायद ही कम फैशनेबल व सामान्य रंग-रूप का दिखाया जाता है। ऐसे में, आम महिलाएं भी छोटे परदे के चरित्रों की चमक-दमक की ओर आकर्षित हो रही हैं।
मुजफ्फरपुर में एक ब्यूटी व फिटनेस सेंटर चलाने वाली नेहा राय का कुछ और ही कहना है। नेहा ने फोन पर बताया- ‘ब्यूटी ट्रीटमेंट लेने, दुबली-पतली नजर आने, अच्छे कपड़े पहनने, सजने-संवरने और फैशनेबल दिखने वाली महिलाओं में दूसरों के मुकाबले कॉन्फिडेंस ज्यादा रहता है। और, ऑफिस जाने वाली महिलाओं, फ्रंट डेस्क एक्जीक्यूटिव्स, सेल्स गल्र्स आदि के लिए तो ऐसा करना विलासिता नहीं, बल्कि मजबूरी है। आपको अपने काम के हिसाब से ही अपनी पर्सनेलिटी डेवलेप करनी पड़ती है।
दुबली-पतली नजर आने वाली और सज-संवरकर फैशनेबल दिखने वाली महिलाओं में दूसरों से ज्यादा कॉन्फिडेंस रहता है.. ऐसा विशेषज्ञ मानते हैं

 

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