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class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

 दुनिया भर के प्रकाशक इंटरनेट पर परोसी जाने वाली ऑनलाइन खबरों के पैसे लेने पर विचार कर रहे हैं। लेकिन इससे मुफ्त ऑनलाइन सामग्री का मिलना खत्म हो जाएगा, यह अभी नहीं कहा जा सकता। पिछले तकरीबन 15 साल से इंटरनेट का इस्तेमाल करने वाले ज्यादातर खबरें, खेल और मनोरंजन की सामग्री मुफ्त में ही हासिल कर लेते हैं। यह सब रातों-रात बदलने वाला नहीं है। कोई भी वेबसाइट जो ऐसी सामग्री इंटरनेट पर उपलब्ध करा रहा है, जो मास मार्केट के लिए है और दूसरी जगह भी उपलब्ध है, उसे ऐसे सामग्री के लिए फीस लेने से पहले कई बार सोचना होगा। ज्यादा संभावना इसी बात की है कि पाठक आपके वेबसाइट पर अपने क्रेडिट कार्ड का नंबर डालने के बजाए, खबरों के किसी वैकल्पिक वेबसाइट पर जाने में ही अपनी भलाई समझेंगे।

वे सारे वेबसाइट जो अपने पाठकों से फीस वसूलने पर विचार कर रहे हैं, उन्हें सोचना होगा कि क्या वे कुछ ऐसी सामग्री या सेवाएं दे रहे हैं, जिनके बिना पाठक का गुजारा नहीं होगा और जो उनके प्रतिस्पर्धी नहीं दे सकते। कोई अखबार या पत्रिका अगर सामग्री के लिए फीस वसूलते भी हैं तो कुछ भरपाई ही होगी। इससे पूरी लागत वसूल होना मुमकिन नहीं है। ‘द टाइम्स’ ने साल भर तक क्रॉसवर्ड और मौसम भविष्यवाणी की सुविधा के लिए लगभग 25 डॉलर की फीस रखी थी, लेकिन इससे बहुत कुछ हासिल नहीं हुआ।

इंटरनेट की दुनिया पूरे एक दशक के विज्ञापन जगत के बूम के सहारे चली, पली और बढ़ी। इसने न सिर्फ मुफ्त सामग्री के दरवाजे खोले बल्कि लोगों को तरह-तरह की सेवाएं भी इसकी वजह से बिना जेब ढीली किए मिलीं। इसी के चलते इस कहावत ने भी जोर पकड़ा, ‘इनफॉरमेशन यानी सूचनाएं मुफ्त होनी चाहिए’। पाठक जब पहली बार इंटरनेट पर आए तो उनसे कोई फीस न वसूल कर खबरों के प्रकाशकों ने जिन्न को बोतल से बाहर निकाल दिया। अब इसे दुबारा बोतल में डालना आसान नहीं हो सकता। चार साल पहले जब ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ ने अपनी विचार वाली सामग्री के लिए फीस लेनी शुरू की तो फीस देने वाले कुछ पाठकों ने यह सामग्री उसके वेबसाइट से उठाकर ब्लॉग पर डाल दी, जिसने इस फीस का मतलब ही खत्म कर दिया। कुछ वेबसाइट ने यह व्यवस्था कर दी कि पाठक सामग्री को विस्तार से पढ़ने के लिए पहले रजिस्टर करा के लॉगिन करें। तो एक वेबसाइट  ु४ेील्लङ्म३.ूङ्मे ने इसका भी तोड़ निकाल दिया। पिछले महीने जब इंटरनेट पाठकों का एक सर्वेक्षण किया गया तो साठ फीसदी की राय थी कि वे पढ़ने के लिए पैसे देने के बजाए विज्ञापन देखना ज्यादा पसंद करेंगे। दरअसल यही वह तरीका है, जिससे हम बरसों-बरस से टेलीविजन और रेडियो पर विज्ञापन और कार्यक्रम देखते आ रहे हैं।

इंटरनेट पर मुफ्त सामग्री उपलब्ध हाेने की उम्मीद की जड़ में यह तथ्य है कि इसे आराम से उठाकर कहीं और चिपकाया जा सकता है। म्यूज़िक इंडस्ट्री से पूछिये, उसने ऐसी तकनीक के इस्तेमाल और ऐसे जुगाड़ बिठाने की कई कोशिशें कीं, जिससे सीडी की नकल होनी बंद हाे जाए। पर आखिर में उन्हें हार माननी पड़ी। इस समय इंटरनेट पर होने वाली संगीत का 9५ फीसदी डॉउनलोड गैरकानूनी होता है। अब तो कई रिकॉर्ड कंपनियां खुद ही मुफ्त संगीत श्रोताओं को उपलब्ध करा रही हैं। जिसमें वे स्पॉटिफॉई जैसी कंपनियों की सेवा लेकर विज्ञापन चिपका देती हैं। इसके अलावा पाठक गूगल पर विभिन्न संवाद एजेंसियों की खबरें विज्ञापन के साथ ही पढ़ सकते हैं। लेकिन लगता है कि अखबार अभी सर्च इंजन से लड़ाई जारी रखना चाहते हैं।

इंटरनेट पर मुफ्त सामग्री का उपलब्ध होना दरअसल विज्ञापन व्यवसाय की सेहत पर भी निर्भर करता है। यह उम्मीद भी की जा रही है कि अगले साल के आखिर तक इस व्यवसाय में फिर से कुछ जान आ जाएगी। और ऐसा भी नहीं है कि इंटरनेट पर महत्वपूर्ण सेवाओं का इस्तेमाल करने वाले पैसा देना ही नहीं चाहते। संगीत उद्योग के कुछ खिलाड़ियों ने महीनेवार सब्सक्रिप्शन की व्यवस्था शुरू की है और इसकी अब तक की सफलता उम्मीद बंधाने वाली है।

डेटिंग वेबसाइट भी अच्छा कर रहे हैं। फ्रेंडस रियूनाइटेड अपने प्रीमियम ग्राहकों से आईटीवी के लिए खासा पैसा कमा रहा है। उसने मंदी के दौरान विज्ञापनों के सूखे से निपटने का तरीका ढूंढ लिया है। लेकिन खबराें के वेबसाइट की ऐसी किस्मत नहीं है। किसी भी प्रकाशक को खबरों के लिए फीस लेने से पहले अपने आप से पूछ लेना चाहिए, ‘क्या मेरे पास अपने पाठकों को देने के लिए ऐसा कुछ है जाे उसे कहीं और नहीं मिल सकता?’

लेखक पेडकंटेंट के संपादक हैं

ब्रिटिश अखबार ‘द गार्जियन’ से साभार
 

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  • Web Title:खबर के दाम की उलझन