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राजनीति के मैन ऑफ द सीरीज़

राजनीति के मैन ऑफ द सीरीज़


 
 
 ढिशुं-ढिशुं क्रिकेट का फाइनल बाकी है। लेकिन भारतीय राजनीति के आइपीएल का फाइनल रिजल्ट सबके सामने है। मुलायम से लेकर माया मैडम तक और लालू से लेकर आडवाणी तक ऑलराउन्डर बन कर इस क्रिकेट के स्टार बनने की ख्वाहिश पाले थे। किन्तु कांग्रेस की गुगली ऐसी चली की सबके सब बोल्ड हो गये। द बड़ी टीमों भाजपा और कांग्रेस के कप्तानों की चर्चा तो सबने की। लेकिन नॉन प्लेयिंग कैप्टन के रूप में अपनी उपस्थिति दर्ज कर रहे राहुल गांधी इस मैच में कैप्टन ऑफ द सिरीज घोषित किये गये। इंडियन क्रिकेट टीम के कैप्टन धोनी की ही तरह राहुल गांधी भी कूल हैं।

धोनी की ही तरह वे अपने फैसले लेते हैं और उन पर अडिग रहते हैं। राजनीति के क्रिकेटिया खेल में सारे बड़े स्टार और कुछेक खेल विशेषज्ञ राहुल गांधी को छोटा-मोटा खिलाड़ी समझ रहे थे। धोनी की ही तरह उन्हें बच्चा भी कहा गया। लेकिन वे भारतीय राजनीति की क्रिकेट टीम के सचिन तेंदुलकर तथा धोनी का मिश्रण निकले। जब वे मैदान में उतरते हैं तो चारों तरफ बॉलों की धुनाई करते हैं। रावल पिंडी एक्सप्रेस शोएब अख्तर की तरह उनमें तेजी दिखती नहीं है, अलबत्ता जब वे बॉल डालने भी मैदान में उतरते हैं, तो उनकी गंेद सीधे विकेट की गुल्लियों को उड़ाती है। शोएब की तरह उनकी अंपायर के द्वारा गेंद वाइड बॉल करार भी नहीं दी जाती है। देखने में तो वे बैक फुट में खेलते हैं,असल में वे फ्रंट फुट पर खेल रहे होते हैं। यही उनके व्यक्तित्व और खेल की खास बात है कि वे जो कर रहे होते हैं, मैदान में खड़े खिलाड़ियों को उसका आभास नहीं होने देते हैं। जब उन्हें प्रधानमंत्री पेश करने की बात उठी तो उन्होंने विनम्रता से कह दिया कि अभी वे इसके लायक नहीं हैं।

असल में वे टीम की कप्तानी तब संभालना चाहते हैं, जब उनकी पार्टी के ही सारे खिलाड़ी हों, ताकि जब वे टीम के कैप्टन बनें, तो दूसरी टीम के खिलाड़ी उनके निर्णयों को चुनौती न दे सकें।  19 जून 19६0 को दिल्ली में जन्में राहुल गांधी को राजनीति विरासत में मिली है। नेहरू-गांधी परिवार से संबंध रखने वाले राहुल के परदादा जवाहरलाल नेहरू, दादी इन्दिरा गांधी और पिता राजीव गांधी देश के प्रधानमंत्री रह चुके हैं। यही नहीं उनकी दादी और पिता दोनों ही आतंकवादी हमले में शहीद हुए हैं। इटालियन मूल की उनकी मां सोनिया गांधी पर भी लंबे समय तक विदेशी मूल का मुद्दा उन्हें परेशान करता रहा। राहुल की शुरूआती पढ़ाई दिल्ली के मॉडर्न स्कूल में हुई। आगे की पढ़ाई के लिये उन्हें सेंट स्टीफेंस स्कूल में दाखिला मेरिट पर नहीं स्पोर्ट्स कोटे में मिला। सुरक्षा कारणों के चलते एक साल बाद 19८0 में उन्हाेंने स्टीफेंस छोड़ दिया। इसके बाद 19८4 में फ्लोरिडा के रोलिन्स कॉलेज से उन्होंने बी. ए. किया। उन्होंने ट्रिनिटी कॉलेज, कैम्ब्रिज से 19८5 में डेवलपमेंट स्टडीज में एम.फिल की।

लंदन में स्ट्रेटजी कंसलटेन्सी फर्म में नौकरी की। इसके बाद वे अपने पिता की मौत के बाद राजनीति में बकइया-बकइया चलने लगे और 2004 में अमेठी से लोकसभा का चुनाव लड़े और जीते। पांच साल के दौरान उन्होंने भारत दर्शन कर देश को समझा। कभी आदिवासी के घर रात गुजारी तो कभी पैदल-पैदल चले। कांग्रेस वर्किंग कमेटी के सदस्य बने। फिर पार्टी के महासचिव। उनके पास काम आया युवा कांग्रेस और छात्र कांग्रेस का। जोरदार मेहनत की।  इस बीच अपने पिता की ही तरह उनका वार रूम काम करता रहा। वे अपनी टीम बनाते रहे। राहुल का ही दम था कि वे पचास से ऊपर एकदम नौजवान सांसदों को लोकसभा तक पहुंचाने में कामयाब रहे। कई बार उनके बयानों ने बखेड़ा भी खड़ा किया। लेकिन अब वे नपा-तुला बोलना सीख गये हैं। पहले वे बोलते थे तो सांसद हंसते थे, अब आदर से सुनते हैं।
 

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