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दुख सब को मांजता है

मुंबई के 2611 के हादसे के शिकार परिवार, देश और विश्व इन आतंकवादियों को माफ नहीं कर सकता। पर इस आतंक की बलि चढ़ी ‘सबीना’ के पति ‘शान्तनु’ ने उन्हें माफ कर दिया। अपने दो बच्चों के सवालों के जवाब उसके पास नहीं थे। आक्रोश, विद्रोह ओर हताशा चैन नहीं लेने दे रहे थे। धीरे-धीरे परिस्थितियों को स्वीकार करने की हिम्मत आई। बच्चों और पिता ने अपना एक सुरक्षा घेरा बना लिया है। सबीना के बिना जीना सीख लिया है। अब किसी से शिकायत नहीं। बड़ा बेटा तो ‘कसाब’ से मिलना चाहता है। उड़ीसा में आस्ट्रेलिया के निवासी फॉदर स्टेनले को दो बच्चों समेत धर्मान्ध लोगों ने जिन्दा जला दिया। पीछे बच गई उनकी पत्नी पल-पल उन झुलसते बच्चों और पति की यंत्रणा को सहती रही। फिर पति का छोड़ा समाज सेवा का काम संभाल लिया। उसकी पीड़ा पिघली। उन अज्ञानियों को उसने माफ कर दिया। राजीव गांधी की हत्या ने राहुल और प्रियंका को सारी दुनिया के प्रति आक्रोश से भर दिया था। आज प्रियंका कहती है कि जब से उसने अपने को शिकार या पीड़ित मानना छोड़ दिया है, तब से मन शांत हो गया। उसे लगता है पिछले 17 साल में ‘नलिनी’ ने भी उतना ही सहा है। इसी भावना ने परिवार को दारुण दुख की स्थिति से उबारा है। अब उसे शिकायत नहीं। इन तीनों हादसों के शिकार कोई संत नहीं। आम इंसान हैं, जो मुक्त होना चाहते हैं। जीना चाहते हैं, क्योंकि जीना तो होगा ही न। दर्द के बोझ को हटा कर ही खुली सांस ले पाएंगे। इसका एकमात्र रास्ता था ‘क्षमा’ का। यह रास्ता दुख की घाटियों से होकर निकलता है। नदी की धारा जसे बड़े पत्थरों से टकरा कर दाएं-बाएं से निकल जाती है, नयी ऊरा पाती है। मनुष्य भी असह्य दुख से टकरा कर,फिर नया रास्ता बनाता है, क्योंकि रुकना तो मृत्यु है, अवसान है। तभी वह दूसर के अपराध और दुख का अर्थ समझता है।

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