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उर्दू प्रेस : वोट के ठेकेदारों से नाराजगी

देश के मुसलमान अब इस भ्रम में नहीं रह गए हैं कि संसद में उनका प्रतिनिधित्व किसी भी पार्टी को स्वीकार है। सभी पार्टियों को मुस्लिम वोटों की जरूरत है, लेकिन इनके वास्तविक प्रतिनिधित्व की नहीं। इसका अनुमान पार्टियों द्वारा खड़े किए गए मुस्लिम उम्मीदवारों की संख्या से लगाया जा सकता है। किसी को इससे क्या सरोकार कि मुसलमानों की समस्याएं क्या हैं, पर चर्चा करती हुई मोनिसा बुशरा आबिदी उर्दू टाइम्स के अपने लेख ‘चुनाव का सबक’ में लिखती हैं कि हर पार्टी का गोपनीय एजेंडा यही है कि मुसलमानों को सत्ता से दूर रखा जाए और नकली नेतृत्व पैदा कर इनके वास्तविक प्रतिनिधित्व को असंभव बना दिया जाए। ‘मुसलमानों ने ठुकराए मौलवियों के पसंदीदा उम्मीदवार’ के शीर्षक से साप्ताहिक जदीद मर्का ने लिखा है कि लखनऊ से दिल्ली तक अलग-अलग सियासी पार्टियों की हिमायत में उतर उलेमा ने पाला बदलने में मौकापरस्त राजनेताओं को भी पीछे छोड़ दिया। लखनऊ के मुसलमानों में इसको लेकर एक नई बहस चल पड़ी है कि सियासी पार्टियों के हाथों बिक जाने वाले लोगों के पीछे क्या नमाज पढ़ना जायज है? वहीं मुसलमान अब यह पता करने की कोशिश में लगे हैं कि आखिर मसिद में इमामत करने वालों को अचानक सियासत में इतनी दिलचस्पी क्यों हो गई है। वह भी इस सूरत में जब यह लोग विभिन्न राजनैतिक पार्टियों के समर्थन में बयान देकर जनता में अपना अनादर करा चुके हैं। अखबार लिखता है कि यह मौलवी भी राजनीति करना चाहें तो करं, लेकिन चुनाव के समय ही पैसा लेकर राजनीति न करं। ‘मिस्र् का परमाणु कार्यक्रम’ शीर्षक से उर्दू टाइम्स ने अपने सम्पादकीय में लिखा है कि अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊरा एजेंसी की रिपोर्ट में खुलासा किया गया है कि मिस्र् अपने परमाणु शोध में हथियार ग्रेड का यूरनियम तैयार कर रहा है, लेकिन इसका दूसरा पहलू यह है कि क्षराइल ने इस खबर पर नकारात्मक या सकारात्मक किसी प्रकार की प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की है। इसके विपरीत क्षराइली राष्ट्रपति शेमोन पैरो ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर धमकी दे रहे हैं कि यदि उसने अपना परमाणु कार्यक्रम बंद न किया तो वइ ईरान पर हमला कर सकता है। अखबार आगे लिखता है कि क्या मिस्र् की सरकार क्षराइल की मर्जी से परमाणु बम बना रही है, यदि इन सवालों का जवाब हां में है तो स्थिति वास्तव में जटिल और पेचीदा है और हम इसकी व्याख्या और विश्लेषण करने में असमर्थ हैं। अखबार मशरिक ने पश्चिमी बंगाल की जेलों में बंद मुस्लिम कैदियों की दयनीय स्थिति पर रिपोर्ट को प्रमुखता से प्रकाशित कर बताया है कि 32 साल के वाम मोर्चा सरकार के शासन काल में राज्य की जेलों में 70 फीसदी मुस्लिम कैदी हैं, जिनमें सैकड़ों बेगुनाह मुसलमान सरकार की अनदेखी से अदालतों द्वारा आरोपी से अपराधी करार नहीं दिए जाने के बावजूद जेलों में बंद हैं। केन्द्र सरकार और सुप्रीम कोर्ट की हिदायत के बावजूद फास्ट ट्रैक और लोक अदालतें स्थापित नहीं हो पाई हैं। इसकी वजह से मुकदमे की सुनवाई में सालों गुजर जाते हैं। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा बिहार में विकास कार्य की उपलब्धियों की समीक्षा कर सामाजिक कार्यकर्ता अफरो अहमद साहिल ने आरटीआई से हासिल जानकारी के आधार पर इस प्रचार को भ्रमित करने वाला बताया है। उनके मुताबिक सरकार के पास न कोई योजना है और न ही टीम, सार फंड वापस हो रहे हैं। ‘हमारा समाज’ की अपनी रिपोर्ट में साहिल ने यह रहस्योद्घाटन किया है कि राजग शासन काल में बिहार को 2003-04 में जो राशि केन्द्र द्वारा दी गई थी, वह संप्रग शासन काल में 2004-05 में दोगुना कर दी गई ताकि बिहार उन्नति कर सके। स्थिति यह है कि बिहार की वर्तमान सरकार को केवल दो सालों में ही 857रोड़ रुपए मिले, जबकि गत सरकार को पांच सालों में 7रोड़ रुपए ही हासिल हुए थे। विश्व बैंक से गरीबी हटाओ मुहिम के लिए 2007-08 में 464.15 करोड़ रुपए मिले, लेकिन सिर्फ 6.13 करोड़ रुपए ही खर्च हुए। यही हाल केन्द्रीय योजनाओं का है। दैनिक सहाफत में ‘स्वात में इस्लामी शरीयत और दुनिया की बेचैनी’ को लेकर मौलाना नदीमउल वाजदी ने लिखा है कि अमेरिका समेत जो देश इसका विरोध कर रहे हैं वह वास्तव में शरीयत की न्याय व्यवस्था है। तालिबान लड़ाकू तो एक बहाना है, इन देशों को यह डर है कि यदि स्वात में यह प्रयोग सफल रहा तो पाकिस्तान के दूसर क्षेत्रों से भी इस्लामी शरीयत को लागू करने की मांग होगी। इस प्रकार पूरा देश वर्तमान दीन से बेजार नेतृत्व के हाथों से निकल कर इस्लाम समर्थकों के हाथों में चला जाएगा।ड्ढr ड्ढr लेखक स्वतंत्र पत्रकार है।

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