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अब मंत्रालय की मलाई पर मंथन

ांग्रेस भले ही लोकसभा में 205 का आंकड़ा आर-पार कर चुकी है, लेकिन उसके सामने नई सरकार के स्वरूप को लेकर अभी अड़चन बनी हुई है। डीएमके जो कि सबसे बड़ा घटक दल है, वह सात कैबिनेट मंत्री चाहता है। इसमें टेलीकॉम, सड़क परिवहन व हाईवे जसे वजनी मंत्रालयों के अलावा गृह मंत्रालय, रेल व वित्त मंत्रालय जसे महत्वपूर्ण मंत्रालयों में राज्यमंत्रियों की मांगे शामिल हैं। शरद पवार की भी कृषि व खाद्य मंत्रालय और नागरिक उड्डयन जसे अहम विभाग जो उनके पास पहले थे, पर नजर होगी। कांग्रेस की मुश्किल यह है कि हर घटक अहम मंत्रालय पाने को नजर गड़ाए हुए है। रालोद के अध्यक्ष अजित सिंह व पूर्व प्रधानमंत्री एच. देवेगौड़ा की पार्टी से भी कांग्रेस के राजनीतिक प्रबंधक बात कर रहे हैं। जाहिर है कि उनकी भी मनमाफिक मंत्रालय की आस है। सबसे अहम मामला सपा व राजद को सरकार में शामिल करने को लेकर फंसा हुआ है। कांग्रेस सूत्रों के अनुसार कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह में यह साझा राय है कि लालू कांग्रेस के पुराने सहयोगी रहे हैं और सपा ने आड़े वक्त संसद में विश्वासमत के दौरान हमारा साथ निभाया है, इसलिए टोकन के तौर पर उन्हें सरकार में शामिल करना चाहिए लेकिन उत्तर प्रदेश व बिहार के कांग्रेसी नेता राजद व सपा को सरकार में शामिल करने के खिलाफ खुलकर आ गए हैं। उत्तर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष रीता बहुगुणा जोशी, कांग्रेस प्रवक्ता राजीव शुक्ला व बिहार कांग्रेस की पूरी टीम चौथे मोर्चे को यूपीए का पार्टनर बनाए जाने का पुराोर विरोध कर रहे हैं। राहुल गांधी इस तर्क से सहमत हैं कि कांग्रेस को यूपी-बिहार के बार में एकला चलो की नीति पर ही चलना चाहिए और चुनाव पूर्व समझौता फामरूले के हिसाब से सपा -राजद से रिश्ते नहीं रखने चाहिए। कांग्रेस आलाकमान की मुश्किल यह है 30 सांसदों वाले चौथे मोर्चे को सत्ता से बाहर रखने पर संसद में अहम विधेयक पास कराने में वक्त- वक्त पर अड़चनें आ सकती हैं, इसलिए समर्थन का जुगाड़ इस तरह से पुख्ता होना चाहिए कि कोई घटक सरकार पर दवाब की राजनीति व सरकार से हटने की धमकी का डंडा न चला सके।

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